27/06/2014

टिम्बकटू की रौनक लौटाई जाएगी

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माली की बौद्धिक और आध्यात्मिक राजधानी टिम्बकटू भारत और पाकिस्तान में सदियों से मशहूर रही है.

टिम्बकटू में विश्व स्तर के अनेक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थल मौजूद हैं मगर उनकी हालत बहुत जर्जर है.

टिम्बकटू की ये ऐसी इमारतें हैं जिनमें बहुत से मशहूर व्यक्तियों की क़ब्रें भी मोजूद हैं.

भारत के ताजमहल और कराची में मोहम्मद अली जिन्ना की क़ब्रों की तरह इन इमारतों को मक़बरे भी कहा जाता है. ये ऐसी क़ब्रें हैं जिन पर भव्य इमारतें खड़ी की गई हैं.

यूनेस्को ने यूरोपीय यूनियन की मदद से टिम्बकटू की इस धरोहर को सजाने-संवारने का बीड़ा उठाया है.

टिम्बकटू के 16 मक़बरों को यूनेस्को ने विश्व धरोहर सूची में शामिल किया हुआ है. लेकिन इनमें से 14 मक़बरे 2012 से 2013 तक चली लड़ाई में तबाह हो गए थे.

इनकी मरम्मत के लिए यूरोपीय यूनियन ने क़रीब तीन लाख 70 हज़ार डॉलर की रक़म मुहैया कराई है. यूनेस्को इन मक़बरों की मरम्मत के काम की देखभाल करेगा.

मस्जिदों और निजी पुस्तकालयों को फिर से आबाद करने की कोशिश की जाएगी.

साथ ही प्राचीन पांडुलिपियों की हिफ़ाज़त का भी इन्तज़ाम किया जाएगा.

टिम्बकटू के लोगों को भी इस तरह की बेशक़ीमती इमारतों की देखरेख के तरीक़ों में ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि भविष्य में इन इमारतों को नुक़सान से बचाया जा सके.

यूनेस्को का कहना है कि माली में जो पांडुलिपियाँ मौजूद हैं उनमें बहुत से ऐसे दस्तावेज़ भी शामिल हैं जिनसे अफ्रीका और मानव जाति का इतिहास पता चलता है. इनमें से कुछ पांडुलिपियाँ तो 13 वीं सदी की भी हैं.

यूनेस्को का ये भी कहना है कि माली में हुई लड़ाई के दौरान हज़ारों बेशक़ीमती पांडुलिपियाँ या तो जल गई थीं या चुरा ली गई थीं. जो हज़ारों बाक़ी बची हैं, उनकी हालत बहुत ख़राब है, इसलिए उनकी देखभाल बहुत ज़रूरी है.

रिपोर्ट प्रस्तुति: महबूब ख़ान