6/07/2013

ग़ाज़ा में मुक्त आवाजाही पर लगी रोक हटे

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संयुक्त राष्ट्र के मानवीय सहायता कार्यक्रमों के संयोजक जेम्स रॉवली ने इसराइल सरकार से अनुरोध किया है कि वो फ़लस्तीनी क्षेत्र ग़ाज़ा पट्टी पर लम्बे समय से लगे प्रतिबन्ध हटा ले ताकि लोगों और सामान की खुली आवाजाही सुनिश्चित की जा सके.

ग़ौरतलब है कि इसराइल ने वर्ष 2007 में ग़ाज़ा पट्टी की आर्थिक नाकेबन्दी शुरू की थी जो अभी तक जारी है.

जेम्स रॉवली ने कहा, "ग़ाज़ा क्षेत्र में इसराइली प्रतिबन्धों की वजह से आम फ़लस्तीनी लोगों के जीवन और उनके रोज़गार पर बहुत बुरा असर पड़ा है. इनमें से कुछ प्रतिबन्ध तो कई दशकों से लगे हुए हैं और इनका बहुत बुरा असर किसानों और मछुआरों पर भी हुआ है.”

जेम्स रॉवली का कहना था कि इसराइली प्रतिबन्धों का सबसे ज़्यादा असर सबसे ग़रीब लोगों पर सबसे पहले और सबसे ज़्यादा पड़ता है.

इन प्रतिबन्धों की वजह से ग़ाज़ा क्षेत्र का विकास ठप पड़ गया है और यहाँ रहने वाले फ़लस्तीनी अब बड़ी संख्या में अन्तरराष्ट्रीय सहायता पर निर्भर होते जा रहे हैं.

हाल में एकत्र किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि ग़ाज़ा क्षेत्र में क़रीब 57 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिनके पास भोजन जुटाने के लिए पर्याप्त धन नहीं है.

80 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं जो किसी ना किसी रूप में अन्तरराष्ट्रीय सहायता पर निर्भर हैं. ग़ाज़ा में खेतीबाड़ी की कुल ज़मीन के लगभग 35 प्रतिशत हिस्से तक पहुँचने पर भी प्रतिबन्ध लगा हुआ है.

इसके अलावा मछली की पैदावार वाले लगभग दो तिहाई इलाक़ों तक पहुँचने पर भी इसराइल ने प्रतिबन्ध लगा रखा है जिससे ग़ाज़ा की अर्थव्यवस्था को साढ़े सात करोड़ डॉलर से भी ज़्यादा का नुक़सान हुआ है.

संयुक्त राष्ट्र के मानवीय सहायता कार्यक्रमों के संयोजक ने गहरी चिन्ता जताते हुए कहा कि अपने खेतों और समुद्र तक पहुँचने पर लगी पाबन्दी लागू करने के लिए इसराइल द्वारा जो तरीक़े अपनाए जाते हैं उनकी वजह से किसानों, मछुआरों और अन्य आम नागरिकों के जीवन को गम्भीर ख़तरे में है.

जेम्स रॉवली ने कहा कि इन प्रतिबन्धों का असर नाकाम करने के लिए जल्द से जल्द कुछ ठोस उपाए किए जाने की सख़्त ज़रूरत है जिनमें ग़ाज़ा के किसानों, मछुआरों और नागरिकों को इन प्रतिबन्धों का सामना करने के लिए तैयार करना भी शामिल हो.

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