28/06/2013

भारत को लोक सेवा के तीन ‘ऑस्कर’

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इस वर्ष भारत की तीन परियोजनाओं को आम लोगों के जीवन में बेहतरी लाने के प्रयासों के तहत संयुक्त राष्ट्र लोक सेवा पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है.

ये पुरस्कार ऐसी परियोजनाओं, नीतियों और प्रयासों के लिए दिया जाता है जिनसे आम लोगों की समस्याओं को दूर करने और उनके जीवन स्तर को सुधारने में ठोस मदद मिली हो. संयुक्त राष्ट्र के लोक सेवा पुरस्कारों को इस क्षेत्र का ऑस्कर कहा जाता है.

केरल के मुख्यमन्त्री चान्डी पुरस्कार ग्रहण करते हुए

केरल के मुख्यमन्त्री ने बहरीन में ख़ुद ये पुरस्कार ग्रहण किया

साथ ही ऐसी योजनाओं और प्रयासों को भी सम्मानित किया जाता है जो ग़रीबी दूर करने और टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने में मददगार साबित हों.

वर्ष 2003 में शुरू किए गए इस पुरस्कार के लिए 23 जून को संयुक्त राष्ट्र लोक सेवा दिवस निर्धारित किया गया है. इस वर्ष 29 देशों को असाधारण परियोजनाओं के लिए पुरस्कृत किया गया.

पुरस्कार समारोह बहरीन की राजधानी मनामा में गुरूवार 27 जून को हुआ. पहली बार ऐसा हुआ कि ये समारोह किसी अरब देश में आयोजित किया गया.

लोक सम्पर्क कार्यक्रम

पुरस्कार पाने वाली पहली भारतीय परियोजना है केरल सरकार का लोक सम्पर्क कार्यक्रम यानी Mass Contact Programme (MCP). इसे केरल के मुख्यमंत्री कार्यालय ने आम लोगों की समस्याएं और शिकायतें दूर करने के कार्यों में तेज़ी लाने के उद्देश्य से शुरू किया था.

ये कार्यक्रम शुरू किए जाने से पहले आमतौर पर लोगों से जो शिकायतें मिलती थीं उन्हें दूर करने के लिए सरकारी दफ़्तरों में बहुत धीमी कार्रवाई होती थी.

इससे सरकारी कामकाज की मशीनरी भी प्रभावित हो रही थी और लोगों को सरकारी योजनाओं का फ़ायदा भी नहीं मिल पा रहा था. इसके नतीजे में लोगों की शिकायतों की संख्या और ज़्यादा बढ़ रही थी.

सरकारी कर्मचारियों के ख़िलाफ़ शिकायतों पर वरिष्ठ अधिकारी कोई कार्रवाई नहीं कर रहे थे और लोगों के पास सरकारी सेवाओं से सम्बन्धित समस्याएं और शिकायतें दूर करने का कोई और विकल्प नहीं बचा था. इस वजह से सरकारी विभागों और सचिवालयों में फाइलों का अम्बार लग गया था और वर्ष 2011 के मध्य तक लगभग एक लाख 32 हज़ार फाइलें अटकी पड़ी थीं.

इसे देखते हुए उसी वर्ष यानी 2011 में लोक सम्पर्क कार्यक्रम यानी एमसीपी शुरू किया गया जिसका मुख्य उद्देश्य लालफीताशाही यानी सरकारी कामकाज में देरी करने की आदत को दूर करना था. इससे सरकारी कर्मचारियों और आम लोगों के बीच बातचीत के ज़रिए आपसी समझ का रास्ता आसान हुआ. जिससे अपनी समस्याओं को दूर कराने के लिए लोग सरकारी कर्मचारियों से बिना झिझक मिलने लगे और भ्रष्टाचार के बिना ही उनकी समस्याएँ भी दूर होने लगीं.

केरल के मुख्यमंत्री ऊमेन चान्डी हर छोटे-बड़े क़स्बे और शहर की यात्रा करके ख़ुद लोगों की शिकायतें सुनने का कार्यक्रम आयोजित करते हैं.

इस तरह लोगों तक सीधी पहुँच बनाने से मुख्यमंत्री ने एक ऐसी प्रक्रिया शुरू की जिसके ज़रिए लोगों का सीधा सम्पर्क प्रशासन और सरकार चलाने वालों और नीतियाँ बनाने वालों से होने लगा. इससे सरकारी मशीनरी में ज़िम्मेदारी और जवाबदेही बढ़ी है. साथ ही आम लोगों की समस्याएँ और शिकायतें दूर करने के में लगने वाला समय भी काफ़ी कम हो गया है.

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स्वावलम्बन

भारत को दूसरी श्रेणी में पुरस्कार मिला है – बिहार के धनबाद ज़िला प्रशासन की एक योजना को जिसका नाम है – स्वावलम्बन.

संयुक्त राष्ट्र लोक सेवा पुरस्कार वितरण 2013, बहरीन

पहली बार ये पुरस्कार वितरण समारोह किसी अरब देश में हुआ

धनबाद ज़िला प्रशासन की इस योजना के तहत पेंशन अदायगी की प्रक्रिया को आसान बनाया गया है. स्वावलन्बन योजना लागू किए जाने से पहले धनबाद में पेंशन अदायगी की प्रक्रिया बहुत जटिल, देर लगाने और थकाने वाली थी जिसमें बहुत बड़ा और भारी क़ाग़ज़ी काम होता था.

ख़ासतौर से नए पेंशनधारियों का पंजीकरण भी बहुत मुश्किल था जिसमें पेंशनधारियों को पारदर्शी और भरोसेमन्द सूचना और जानकारी भी नहीं दी जाती थी.

अक्सर पेंशनधारियों को अपना हक़ पाने के लिए कई महीने तक इन्तज़ार करना पड़ता था, यहाँ तक कि कभी – कभी तो रिश्वत भी देनी पड़ती थी.

वैसे तो सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि पेंशनधारी को हर महीने पेंशन मिलनी चाहिए लेकिन अक्सर तीन-तीन महीने बाद पेंशन लोगों के हाथों में आती थी. जिससे सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी उल्लंघन होता था.

हर तरफ़ भारी भ्रष्टाचार का बोलबाला था जिसमें बहुत से फ़र्ज़ी पेंशनधारी भी बन गए और बहुत से ऐसे पेंशनधारियों के नाम पर भी पेंशन ली जा रही थी जिनकी मृत्यु हो चुकी थी. लेकिन स्वावलम्बन योजना के ज़रिए पेंशन जारी होने के लिए तीन दिन की समय सीमा निर्धारित कर दी गई.

इसमें पेंशनधारी को मिलने वाला धन सीधे उसके खाते में पहुँचाने की व्यवस्था की गई. इसके अलावा तमाम पेंशनधारियों का रिकॉर्ड कम्प्यूटर में इस तरह से सुरक्षित किया गया कि उसे आसानी से पढ़ा जा सके जिससे पेंशन जारी करने का काम कम्प्यूटर का माउस क्लिक करने भर से किया जाने लगा है.

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महिला चालित हाट बाज़ार

श्रेणी पाँच में भारत को पुरस्कार मिला है – लघु एवं ग्राणीण उद्योग विभाग की ग्रामीण हाट परियोजना के लिए.

वैसे तो मध्य प्रदेश में महिलाओं की आबादी भी लगभग 50 प्रतिशत है लेकिन हर स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बहुत कम है.

संसाधनों पर भी महिलाओं को कोई अधिकार हासिल नहीं हैं. परिवार और समाज के लिए उनके योगदान को भी कोई पहचान नहीं मिलती है.

भारत में छोटे-छोटे स्थानों पर लगने वाले साप्ताहिक बाज़ारों यानी हाट का काफ़ी चलन रहा है.

इन हाट बाज़ारों का प्रशासन देखने वाली हाट विकास समिति ने महिलाओं का एक ग्रुप बनाया जिसे ख़ुद के हाट बाज़ार लगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया. सिर्फ़ महिलाओं ने ऐसा पहला हाट दस वर्ष पहले दिगवर गाँव में लगाया था.

ये पहला मौक़ा था जब अनपढ़ और अनुभवहीन ग्रामीण महिलाओं ने हाट बाज़ार लगाया था जिसका सारा इन्तज़ाम उन्होंने ही किया था.

उन्हें 150 दुकानें बनाने के लिए ज़मीन दी गई और पानी और साफ़-सफ़ाई की सुविधाएँ मुफ़्त दी गईं.

उसके बाद से तो हाट बाज़ार में महिलाओं ने बहुत अच्छा काम किया है और 36 हाट बाज़ारों में 1,775 दुकानें बना ली हैं. इनमें लगभग 1800 दुकानदारों को फ़ायदा होता है और ये फ़ायदा 217 गाँवों के चार लाख 15 हज़ार ग्रामीणों तक भी पहुँचता है.

हाट बाज़ार के ज़रिए महिलाओं ने कारोबार चलाने के गुर सीखे जिससे ना सिर्फ़ उनकी ख़ुद की ज़िन्दगी सुधरी बल्कि परिवारों और समाज को भी फ़ायदा हुआ. इससे भारी संख्या में महिलाओं में आत्मविश्वास जागा है जिससे परिवार और समाज में भी उनका सम्मान बढ़ा है.

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