7/06/2013

महिलाओं पर हिंसा गहरे पूर्वाग्रह की निशानी

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संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त नवी पिल्लई का कहना है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा करना उनके ख़िलाफ़ लिंग आधारित भेदभाव के गहरे बैठे पूर्वाग्रह को दिखाता है.

नवी पिल्लई

अब भी महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा जारी है जो अस्वीकार्य है

महिलाओं के अधिकारों पर विचार करने के लिए बुधवार को मानवाधिकार परिषद के वार्षिक आयोजन में नवी पिल्लई ने कहा कि 1990 के दशक से पहले तक तो महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को निजी मामला समझा जाता था और इसे मानवाधिकार का ऐसा मुद्दा भी नहीं माना जाता था जिसका अन्तरराष्ट्रीय समुदाय से कोई सरोकार हो.

लेकिन 1990 के दशक के बाद से हालात में बदलाव आया है. नवी पिल्लई का कहना था कि इस बदलाव का असल मोड़ 1993 का वियेना घोषणा पत्र था जिसमें महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को अन्तरराष्ट्रीय महत्व वाला मानवाधिकार का मुद्दा स्वीकार किया गया.

नवी पिल्लई का कहना था, "अन्तरराष्ट्रीय प्रयासों की ही तरह राष्ट्र स्तर पर भी प्रयास किए गए हैं. महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा से निपटने के लिए सभी देशों ने ठोस उपाय किए हैं जिनमें क़ानूनी प्रावधान करने, संस्थान और नीतियाँ बनाया जाना शामिल है.”

“लेकिन इन उपायों पर संतोष व्यक्त करते समय हम ये भी ना भूलें कि महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा अब भी दुनिया के तमाम हिस्सों में जारी है जिसे क़तई स्वीकार नहीं किया जा सकता."

नवी पिल्लई ने ये भी कहा कि 1995 में महिलाओं की स्थिति पर हुए बेजिंग सम्मेलन और महिलाओं की स्थिति पर बने आयोग के 57वें सत्र से महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को रोकने और उनके सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के प्रयास कामयाब साबित तो होते हैं लेकिन शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य और सार्वजनिक जीवन के तमाम क्षेत्रों में महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित करना भी बहुत ज़रूरी है.

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