27/05/2013

जाति प्रथा के ख़िलाफ़ बिगुल

सुनिए /

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने दक्षिण एशिया में जाति प्रथा के अभिशाप से लोगों को बचाने का बिगुल बजाया है.

इन विशेषज्ञों का कहना है कि दक्षिण एशियाई देशों में क़रीब 26 करोड़ लोग जाति प्रथा के शिकार होकर अपना जीवन बहुत दयनीय हालात में जीते हैं और उनके साथ हर क्षेत्र में भेदभाव होता है. इन विशेषज्ञों ने आहवान कि है कि इन लोगों को इस चंगुल से निकाले जाने की सख़्त ज़रूरत है.

दलित महिलाओं के लिए बहुत असुरक्षित माहौल है

भारत में दलित महिलाओं के लिए बहुत असुरक्षित माहौल है

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का ये भी कहना है कि जाति प्रथा के शिकार लोगों को आमतौर पर दलित कहा जाता है और उन्हें अछूत भी समझा जाता है यानी उनके साथ किसी भी तरह का मानवीय सम्बन्ध रखने से परहेज़ किया जाता है.

उनके साथ खाना-पीना तो दूर की बात, उनसे हाथ मिलाना, उनके घर में एक साथ उठना-बैठना या उनके किसी पारिवारिक समारोह में शामिल होना भी बुरा माना जाता है.

जाति प्रथा में दलितों या अछूत समझे जाने वाले लोगों को समाज में सबसे निचले दर्जे पर रखा जाता है क्योंकि जाति प्रथा के मानने वाले ये मानते हैं कि दलित या अछूत लोग अशुद्ध होते हैं और उन्हें समाज में समानता के साथ जीवन जीने का अधिकार नहीं है.

जाति प्रथा में सर्वश्रेष्ठता के नज़रिए से सबसे ऊपर ब्राहमण, उसके बाद क्षत्रिय, फिर वैश्य, फिर शूद्र और सबसे नीचे दलित या अछूत को रखा जाता है.

जाति प्रथा को मानने वालों का कहना है कि ये दर्जा इन्सान के जन्म और पूर्व जन्म में किए गए कर्मों के आधार पर निर्धारित होता है.

लेकिन जीवन की बराबरी में विश्वास रखने वालों का कहना है कि ये धारणा ग़लत है और जन्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति को किसी अन्य पर कोई प्राथमिकता नहीं मिलनी चाहिए यानी सबको जीवन में बराबर अवसर मिलने चाहिए.

लेकिन जाति प्रथा के शिकार लोगों को जीवन के हर स्तर पर गम्भीर भेदभाव का सामना करना पड़ता है, उन्हें समाज की मुख्य धारा और आर्थिक गतिविधियों से अलग-थलग रखा जाता है, उनके रहने के स्थान अलग होते हैं ताकि आसानी से उनकी पहचान की जा सके.

यहाँ तक कि उन्हें बुनियादी सेवाओं का भी फ़ायदा नहीं मिलता और अक्सर उनसे इस तरह का और इन परिस्थितियों में काम कराया जाता है जो दास बनाने जैसा होता है.

संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि ख़ासतौर से दलित लड़कियों और महिलाओं का जीवन चप्पे – चप्पे पर ख़तरों से भरा होता है. उनके साथ हर स्तर पर भेदभाव होता है जिनमें यौन हिंसा भी शामिल है. यहाँ तक कि यौन गतिविधियों के लिए उनको बेचा और ख़रीदा भी जाता है.

इन मानवाधिकार विशेषज्ञों ने दक्षिण एशियाई देशों का आहवान किया है कि जाति प्रथा और उसके तहत होने वाली हिंसा को रोकने के लिए सख़्त क़ानून बनाएँ और जाति प्रथा चलाने वाले और इसे बढ़ावा देने वालों को दंडित करने के लिए ठोस उपाय किए जाएँ.

साथ ही दलितों के ख़िलाफ़ भेदभाव और उनके सामाजिक बहिष्कार से सम्बन्धित सदियों से चली आ रही समस्याओं का हल निकालने के लिए मज़बूत राजनीतिक नेतृत्व, सटीक कार्रवाई और पर्याप्त संसाधनों का इन्तज़ाम करना होगा.