11/01/2013

सीरिया में लाखों लोगों को भोजन की सख़्त ज़रूरत

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सीरिया में भोजन की क़िल्लत

सीरिया में हिंसा की वजह से कुछ इलाक़ों में भोजन की भारी क़िल्लत हो गई है

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एजेंसी ने कहा है कि हिंसा ग्रस्त सीरिया में करीब 25 लाख लोगों को भोजन की सख़्त ज़रूरत है साथ ही वहाँ खाद्य पदार्थों के दाम तेज़ी से बढ़ रहे हैं.

विश्व खाद्य कार्यक्रम डब्ल्यू एफ़ पी (WFP) ने आगाह किया है कि सीरिया में असुरक्षा की वजह से उन लोगों को भोजन मुहैया कराने के प्रयासों पर नकारात्मक असर पड़ रहा है जो हिंसा की वजह से विस्थापित हो गए हैं.

एजेंसी का कहना है कि देश के अनेक हिस्सों में आटे की मिलों को व्यापक नुक़सान पहुँचने की वजह से गेहूँ के आटे की सख़्त क़िल्लत है.

साथ है ऐसी भी ख़बरें हैं कि ईंधन आपूर्ति में बाधा, सड़कों के बंद होने और यातायात में मुश्किलों की वजह से भी लोगों को भोजन नहीं मिल पा रहा है.

जिनेवा में विश्व खाद्य कार्यक्रम की प्रवक्ता एलिज़ाबेथ बिर्स का कहना था, “अनुमान के अनुसार सीरिया में लगभग 25 लाख लोगों को भोजन सहायता की सख़्त ज़रूरत है.”

“अक्तूबर में सीरियाई अरब रैड क्रेसेंट की तरफ़ से ये अनुरोध प्राप्त हुआ था कि खाद्य पदार्थों के ज़रूरतमंदों की संख्या 15 लाख से बढ़ाकर 25 लाख कर दी जाए. हालाँकि इस काम में अनेक अन्य एजेंसियों के शामिल होने की वजह से भोजन सहायता संभव नहीं हो सकी."

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एजेंसी की प्रवक्ता एलिज़ाबेथ बिर्स ने ये भी कहा कि सुरक्षा कारणों की वजह से सीरिया में एजेंसी के अनेक दफ़्तरों के कर्मचारियों को दूसरे स्थानों पर भेजा गया है.

 तम्बाकू उत्पादों में अवैध व्यापार रोकने के लिए नई संधि

तम्बाकू उत्पादों में अवैध व्यापार को रोकने के प्रयासों के तहत विश्व स्वास्थ्य संगठन की देखरेख में एक नई संधि की गई है. तंबाकू उत्पादों में अवैध व्यापार को रोकने का लक्ष्य लोगों को तंबाकू से संबंधित स्वास्थ्य ख़तरों से बचाना है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस संधि को तस्करी और अन्य अवैध गतिविधियों की वजह से आम लोगों और सरकारों को होने वाले नुक़सान से बचाने में एक कारगर हथियार क़रार दिया है.

संगठन की महानिदेशक डॉक्टर मार्गरेट चैन ने चार वर्ष तक चली बातचीत के बाद हुई इस संधि पर सदस्य देशों को बधाई देते हुए कहा, ” सभी जानते हैं कि तम्बाकू उत्पाद स्वास्थ्य के लिए गंभीर ख़तरा हैं जिसका हम सभी को एक जुटता के साथ मुक़ाबला करना होगा.”

“ये संधि इस दिशा में एक महत्वपूर्ण क़दम है. ये इस बात का भी सबूत है कि सरकारों के विभिन्न अंग अगर मिलकर काम करें तो स्वास्थ्य बचाने की ख़ातिर कितने अच्छे परिणाम हासिल किए जा सकते हैं."

संगठन के आँकड़े बताते हैं कि तम्बाकू की वजह से प्रतिवर्ष लगभग साठ लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है.

विकासशील देशों में पारे से स्वास्थ्य के लिए गंभीर ख़तरा

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के एक नए अध्ययन में पता चला है कि विकासशील देशों में मर्करी यानी पारे के बढ़ते संपर्क की वजह से लोगों में स्वास्थ्य संबंधी ख़तरे बढ़ रहे हैं.

वैश्विक पारा आकलन 2013 नामक इस रिपोर्ट में कहा गया है कि स्वर्ण खदानों से निकलने वाले इस ज़हरीले पदार्थ यानी पारे की मात्रा 2005 के मुक़ाबले दोगुनी हो गई है.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानी UNEP का कहना है कि अफ्रीका, एशिया और दक्षिणी अमरीका के कुछ हिस्सों में स्वर्ण खदानों में इसके इस्तेमाल की वजह से वातावरण में पारे की मात्रा बढ़ी है.

साथ ही इसका इस्तेमाल बिजली उत्पादन में भी किया जा रहा है.

रिपोर्ट आगाह करती है कि पारे के सम्पर्क में आने की वजह से – एक से डेढ़ करोड़ ऐसे लोगों के स्वास्थ्य को ख़तरा पैदा हो गया है जो स्वर्ण खदानों में काम करते हैं. इनमें तीस लाख महिलाएँ और बच्चे भी हैं.

अनुमान लगाया है कि एशिया में तेज़ी से हो रहे औद्योगिक विकास की वजह से वहाँ पारे का उत्सर्जन अन्य महाद्वीपों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा हो रहा है. और ये उत्सर्जन पूरी दुनिया में हो रहे उत्सर्जन का लगभग आधा हिस्सा है.

संयुक्त राष्ट्र के इस अध्ययन में कहा गया है कि एक ऐसी बाध्यकारी संधि बनाकर इस दिशा में कुछ सकारात्मक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं जिसके तहत पारे की माँग को कम करने वाली – वैकल्पिक तकनीक को बढ़ावा दिया जाए.

घरेलू काम करने वालों की परिवारों और समाज के लिए महत्ता पर ज़ोर

घरेलू कामकाजी

घरेलू काम करने वालों के अधिकारों पर ध्यान देने का आहवान किया गया है

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आई एल ओ (ILO) ने कहा है कि दुनिया भर में पचास करोड़ से ज़्यादा लोग घरेलू काम के लिए रोज़गार में लगे हुए हैं जिनमें बड़ी संख्या महिलाओँ की है.

श्रम संगठन का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद ये लोग रोज़गार संबंधि सुरक्षाओं से वंचित हैं.

इन घरेलू कामकाजियों को दिन में बहुत देर तक काम करना पड़ता है और उनके कामकाज के हालात भी बहुत ख़राब होते हैं, इतना ही नहीं, उन्हें क़ानूनी संरक्षण भी हासिल नहीं होता है.

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की उप महानिदेशक सैंड्रा पोलास्की का कहना है, “घरेलू कामकाज में लगे बच्चों, महिलाओं, बुज़ुर्गों और विकलांगों का ख़याल करने की सख़्त ज़रूरत है. घरेलू कामकाज करने वाले लोग भी सामाजिक ताने-बाने का अहम हिस्सा हैं. साथ ही ये श्रम क्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं जबकि अभी तक ऐसा नहीं समझा गया है.”

“चिंता की बात ये है कि घरेलू कामकाज करने वाले ज़्यादातर लोगों का शोषण होता है. उनके साथ भेदभाव होता है और उनका बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन भी होता है. इनमें से बहुत से घरेलू कामकाजी मानसिक, शारीरिक और यौन शोषण का भी शिकार होते हैं."

ऐसा पहली बार हुआ है कि अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने इसे दुनिया का सबसे पुराना परंपरागत कामकाज बताते हुए इसके आकार और अहमियत के बारे में रिपोर्ट जारी की है.

विज्ञान और प्रोद्योगिकी क्षेत्र में महिलाओं के पिछड़ने का ख़तरा

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन – आई एल ओ की एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि विज्ञान और प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में तीव्र गति से प्रगति हो रही है जिससे कामकाज के नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं.

लेकिन इस क्षेत्र में महिलाओं के पिछड जाने का भी ख़तरा देखा गया है.

आई एल ओ के एक पदाधिकारी क्लाउड अकपोकावी ने सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों यानी Millennium Development Goals की प्रगति की समीक्षा रिपोर्ट तैयार की है.

इन लक्ष्यों में महिलाओं को सशक्त करने और उनके लिए ज़्यादा अवसर मुहैया कराना भी शामिल है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाएँ कला और समाज अध्ययन से संबंधित विषयों में ज़्यादा दिलचस्पी दिखाती है जबकि विज्ञान और प्रोद्योगिकी क्षेत्र में उनकी संख्या कम नज़र आती है.

रिपोर्ट में ऐसे उपाय करने का आहवान किया गया है जिनके ज़रिए ये असंतुलन दूर करने के लिए प्रयास किए जा सकें.

रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि ये चलन विकसित और विकासशील दुनिया में समान रूप से देखा गया है, जिसमें लड़कियों को इंजीनियरिंग, कम्प्यूटर या फिर विज्ञान विषयों में लड़कों के मुक़ाबले ज़्यादा दिलचस्पी लेते हुए देखा जाता है.

एशिया प्रशांत क्षेत्र में एचआईवी – एड्स की चुनौती के ख़िलाफ़ प्रगति

एशिया प्रशांत क्षेत्र में एड्स के लिए संयुक्त राष्ट्र महासचिव के विशेष दूत प्रसाद राव याद करते हुए कहते हैं कि उन्हें वो दिन आज भी अच्छी तरह याद है जब 15 वर्ष पहले वो थाईलैंड में एच आई वी संक्रमित एक अनाथ बच्चे से मिले थे जिसके सिर्फ़ पाँच वर्ष जीने की उम्मीद जताई गई थी.

लेकिन 15 वर्ष बाद अब कारगर दवाइयों के विकास और उपलब्धता की बदौलत एच आई वी के मरीज़ों के लिए हालात बहुत बेहतर हुए हैं.

एशिया और प्रशांत क्षेत्र में एच आई वी और एड्स के विस्तार को रोकने के लिए किए जा रहे प्रयासों की जनकारी महासचिव बान की मून को देने के लिए प्रसाद राव ने हाल ही में न्यूयॉर्क का दौरा किया था.

प्रसाद राव का कहना था, “एक दशक पहले यह एक बहुत ही गंभीर और बड़ी चुनौती थी लेकिन इस चुनौती का कारगर तरीक़े से सामना करने के लिए क्षेत्रीय सरकारें बधाई की पात्र हैं.”

“बेशक ये राहत की बात कि पिछले दस वर्षों में संक्रमण के नए मामलों की संख्या में कमी आई है. मगर फिलीपीन्स, इंडोनेशिया, वियतनाम, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे देशों में समस्या अब भी गंभीर है. इसलिए मैं ये नहीं कहूँगा कि हमने पूरी कामयाबी हासिल कर ली है. मगर सही दिशा में काफ़ी प्रगति हुई है और चुनौती भी बनी हुई है."

विशेष एच आई वी और एड्स दूत प्रसाद राव का ये भी कहना था कि वो ऐसा दिन आने की उम्मीद से भरे हुए हैं जब कोई भी बच्चा इस संक्रमण के साथ पैदा नहीं होगा.

राजनयिक मदन जीत सिंह के निधन पर शोक

मदन जीत सिंह

भारतीय मूल के मदनजीत सिंह ने दक्षिण एशिया में शांति और सहिष्णुता के लिए सराहनीय काम किया

दक्षिण एशिया में आपसी समझ और शांति के लिए काम करने वाले भारतीय राजनयिक मदन जीत सिंह के निधन को दुनिया भर के लोगों के लिए एक बड़ा नुक़सान बताया गया है.

संयुक्त राष्ट्र शिक्षा, विज्ञान और सांस्कृतिक संगठन यानी यूनेस्को (UNESCO) की अध्यक्ष इरीना बोकोवा ने एक वक्तव्य जारी करके ये बात कही है.

दिल का दौरा पड़ने के बाद रविवार को 88 वर्ष की अवस्था में मदन जीत सिंह का फ्रांस में निधन हो गया था.

मदन जीत सिंह को दुनिया भर में सहिष्णुता और परस्पर समझ को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता था.

सहिष्णुता और अहिंसा को बढ़ावा देने के मदन जीत सिंह के प्रयासों को सम्मानित करने के लिए 1995 में यूनेस्को के कार्यकारी बोर्ड ने उनके नाम पर एक पुरस्कार की भी स्थापना की थी.

मदन जीत सिंह ने दक्षिण एशिया क्षेत्र में टिकाऊ सांस्कृतिक, शैक्षिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में युवा आंदोलन के तौर पर वर्ष 2000 में दक्षिण एशिया संस्थान की स्थापना की थी.

नवंबर 2000 में मदन जीत सिंह को यूनेस्को का गुडविल एम्बेसेडर यानी सदभावना दूत मनोनीत किया गया था.

यूनेस्को की महानिदेशक इरीना बोकोवा ने कहा कि मदन जीत के निधन के बाद एजेंसी ने एक सच्चा दोस्त और महान समर्थक खो दिया है.

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