10/05/2013

धीमी अर्थव्यवस्था से युवा बेरोज़गारी बढ़ी

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अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आई एल ओ की एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि अर्थव्यवस्थाओं में सुधार की धीमी रफ़्तार की वजह से इस वर्ष क़रीब साढ़े सात करोड़ युवाओं को अपने कामकाज और नौकरियों से हाथ धोना पड़ेगा.

रिपोर्ट कहती है कि बीते वर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार बहुत धीमी गति से हो रहा है जिसकी वजह से युवाओं के लिए कामकाज और नौकरियों के अवसरों का संकट और गहरा गया है.

इसलिए जो नौकरियाँ या कामकाज उपलब्ध हैं, उनके लिए लाइन और लम्बी होती जा रही हैं.

आई एल ओ का कहना है कि युवाओं के लिए रोज़गार की क़िल्लत का असर दशकों तक महसूस किया जाएगा जिससे एक ऐसी पीढ़ी देखने को मिलेगी जो अपनी पूरी ज़िन्दगी में अच्छी नौकरियाँ या कामकाज नहीं पा सकेगी.

आई एल ओ के सहायक नीति महानिदेशक होज़े मैनुअल सलायार का कहना है कि आर्थिक प्रगति में जान फूँकने के लिए और ज़्यादा प्रयासों और उपायों की ज़रूरत है. साथ ही शिक्षा और ट्रेनिंग में बहुत ज़्यादा सुधार किए जाने की ज़रूरत है और ख़ासतौर से युवाओं के लिए उपयुक्त रोज़गार उपलब्ध कराने पर ध्यान देना होगा.

उनका कहना था, “बेशक अर्थव्यवस्था में ऊँची प्रगति दर हासिल करने की सख़्त ज़रूरत है लेकिन सिर्फ़ इतने भर से काम नहीं चलेगा. हम हर देश से सिफ़ारिश करते हैं कि युवाओं को ध्यान में रखकर उनकी ज़रूरतों के अनुसार रोज़गार के अवसर बनाए जाएँ. इसमें ये करना ज़रूरी है कि युवाओं में ऐसी कुशलताएँ और प्रशिक्षण क्षमताएँ विकसित की जाएँ जिनकी रोज़गार देने वाली कम्पनियों को ज़रूरत होती है.”

“इसके साथ ही छोटे और मध्यम दर्जे के व्यवसायों को धन सहायता उपलब्ध कराना भी ज़रूरी है ताकि वो कम्पनियाँ युवाओं को ज़्यादा से ज़्यादा काम दे सकें. ये भी ज़रूरी है कि युवा कर्मचारियों और कामकाजियों को भी वैसी ही सुविधाएँ और सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराई जाए जैसी कि परिपक्व और वरिष्ठ कामकाजियों को मिलती हैं.”

आई एल ओ की इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि मध्य पूर्व के देशों में बेरोज़गार युवाओं की संख्या बहुत ज़्यादा है और उन देशों में लगभग तीस प्रतिशत युवा बेरोज़गार हैं. चिन्ता की बात ये है कि धनी देशों में भी बेरोज़गार युवाओं की संख्या बीस प्रतिशत तक है.