5/05/2013

महिला हिंसा पर विशेष दूत का भारत दौरा

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महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत राशिदा मन्जू ने भारत की दस दिन की यात्रा करने के बाद कहा है कि यहाँ हालाँकि महिलाओं की सुरक्षा के लिए बहुत से क़ानून हैं मगर असल में उन क़ानूनों का सही ढंग से पालन नहीं होता जिसका ख़ामियाज़ा महिलाओं को भुगतना पड़ता है.

अपनी दस दिन की यात्रा के दौरान राशिदा मन्जू ने दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और मणिपुर में अनेक मुलाक़ातें कीं और तमिलनाडु सहित अनेक राज्यों से महिलाओं की स्थिति पर जानकारी एकत्र की.

उन्होंने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए क़ाग़ज़ों पर बहुत से सकारात्मक उपाय नज़र आते हैं लेकिन दुर्भाग्य से वास्तविकता ये है कि भारत में अनगिनत महिलाओं के अधिकारों का अब भी धड़ल्ले से उल्लंघन होता है. इसमें बड़ी चिन्ता की बात ये है कि महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन करने वालों को क़ानून का कोई डर नहीं होता और बहुत से मामलों में दोषियों को कोई सज़ा नहीं मिलती.

राशिदा मन्जू का कहना था, "महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा के मामलों में बीच-बचाव और मुआवज़ा देकर मामले को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिश की जाती है जिससे इस हिंसा के लिए ज़िम्मेदार लोग क़ानून की जकड़ से आसानी से बच जाते हैं और इनमें से अक्सर आगे चलकर क़ानून के डर के बिना और अपराध करते हैं.

“महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए क़ानूनी प्रावधानों और उन्हें लागू करने में बड़ा अन्तर है, और ज़्यादातर मामलों में पुलिस और सुरक्षा अधिकारियों से प्रभावित महिलाओं को पूरा सहयोग नहीं मिलता. दुखद बात ये है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के बुनियादी कारणों और सोच को बदलने के लिए कोई ठोस उपाय नज़र नहीं आते हैं."

राशिदा मन्जू ने 16 दिसम्बर 2012 को दिल्ली में सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई महिला की मौत के बाद भारत सरकार के प्रयासों की सराहना तो की लेकिन अफ़सोस जताते हुए ये भी कहा कि उस घटना के बाद गठित न्यायमूर्ति जे एस वर्मा समिति की सिफ़ारिशों को क़ानूनी प्रावधानों में समुचित जगह नहीं दी गई है.

महिलाओं के ख़िलाफ़ घरेलू हिंसा के मामलों पर चिन्ता जताते हुए राशिदा मन्जू ने कहा कि बहुत सी महिलाएँ ऐसे पारिवारिक माहौल में रहती हैं जहाँ पुरुष के वर्चस्व और महिलाओं की कमतर स्थिति को सामान्य रूप में स्वीकार किया जाता है.

महिलाओं को इस हीनता की भावना से बाहर निकालने के असरदार उपायों की कमी और हिंसा से बचाने में सरकार की नाकामी की वजह से हालात बहुत ख़राब रहे हैं. बहुत सी महिलाएँ आर्थिक रूप से भी पुरुषों पर ही निर्भर होती है जिसकी वजह से उनमें आत्मविश्वास नहीं बन पाता और वो घरेलू हिंसा का मुक़ाबला नहीं कर पातीं.

AFSPA

हिंसा ग्रस्त क्षेत्रों में महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा में राशिदा मन्जू ने ख़ासतौर से Armed Forces Special Powers Act यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम के प्रावधानों का ज़िक्र किया. ये अधिनियम जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में लागू हैं और मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि सेना और सशस्त्र बल अक्सर इस क़ानून का सहारा लेकर महिलाओं के यौन अधिकारों का उल्लंघन करते हैं.

राशिदा मन्जू का कहना था, “Armed Forces Special Powers Act का इस्तेमाल मानवाधिकारों के उल्लंघन में बढ़चढ़कर किया गया है और इस एक्ट की वजह से मानवाधिकार उल्लंघन करने वालों को क़ानून का डर नहीं रह गया है. इस एक्ट की वजह से सेना और सशस्त्र बलों के जवान और अधिकारी मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में असैनिक यानी नागरिक अदालतों में मुक़दमा चलाए जाने से बच जाते हैं. जबकि वो नागरिकों, ख़ासतौर से महिलाओं के यौन अधिकारों का उल्लंघन करते हैं.

“इस एक्ट की वजह से क़ानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया की अहमियत भी कम होती है. प्रभावित महिलाओं से बात करके पता चलता है कि इस एक्ट को मौजूदा रूप में लागू करने की वजह से मूलभूत अधिकारों और स्वतंत्रताओं का उल्लंघन हो रहा है. जिनमें एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की स्वतंत्रता, सम्मेलन करने की स्वतंत्रता और शान्तिपूर्ण सभा करने की स्वतांत्रता शामिल है. इसके अलावा इस एक्ट की वजह से जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में महिलाओं की सुरक्षा, आत्मसम्मान और शारीरिक सम्मान के अधिकारों का उल्लंघन होता है."

राशिदा मन्जू ने कहा कि ये अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है कि शान्तिपूर्ण और वैध प्रदर्शनों को भी देश की सुरक्षा के नाम पर सैनिक बल के सहारे दबा दिया जाता है जिससे डर का माहौल बन रहा है और प्रतिरोध की भावना भी बढ़ रही है. राशिदा मन्जू ने भारत सरकार से माँग की कि Armed Forces Special powers Act को लागू करने में इस तरह और इतना सुधार किया जाए जिससे इस एक्ट का सहारा लेकर महिलाओं के मानवाधिकारों का उल्लंघन ना किया जा सके.

राशिदा मन्जू भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा की स्थिति के बारे में अपनी विस्तृत रिपोर्ट जून में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को सौंपेंगी. राशिदा मन्जू को 2009 में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत नियुक्त किया गया था. राशिदा मन्जू किसी सरकार या संगठन से सम्बद्ध नहीं हैं और निष्पक्ष रूप में काम करती हैं. राशिदा मन्जू केपटाउन विश्वविद्यालय में लोक विधि विभाग में प्रोफ़ेसर भी हैं.

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