4/05/2013

प्रेस आज़ादी दिवस पर सुरक्षा की गुहार

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संयुक्त राष्ट्र ने तीन मई को विश्व प्रेस आज़ादी दिवस मनाया जिस दौरान पत्रकारों और मीडियाकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आहवान किया गया. इस अभियान को नाम दिया गया Safe to Speak.

हर वर्ष तीन मई को ये दिवस मनाया जाता है जिसकी शुरूआत दिसम्बर 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने की थी. यूनेस्को का कहना है कि गत वर्ष 121 पत्रकारों की मौत हो गई जो उससे पिछले के वर्षों यानी 2010 और 2011 में हुई मौतों से दोगुना है.

न्यूयॉर्क में यूनेस्को कार्यालय के निदेशक फिलिप क्रिदेलका का कहना था कि पत्रकारों और मीडिया कर्मियों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों के दस में नौ मामलों में अभियुक्तों को कोई सज़ा नहीं मिलती है. ये अब और नहीं चल सकता.

हिंसा और क़ानून का डर नहीं रहने की स्थिति से बुनियादी अधिकार और स्वतंत्रताएँ ख़तरे में पड़ती हैं और इनकी वजह से क़ानून के शासन में आम लोगों का भरोसा कम होता है. साथ ही हिंसा और क़ानून का डर निकलने से प्रशासन और सरकार चलाने का काम भी दूषित होता है.

उधर संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने कहा है कि तमाम पत्रकारों की सुरक्षा इस तरह सुनिश्चित किए जाने की ज़रूरत है कि वो अपना काम बिना किसी डर के कर सकें क्योंकि जब अपनी बात कहना सुरक्षित होता है तो इससे पूरी दुनिया को फ़ायदा होता है.

उन्होंने कहा कि पत्रकारों को सरकारों, बड़ी – बड़ी कम्पनियों, आपराधिक गुटों, हथियार बन्द लोगों और इसी तरह के अन्य समूहों के ख़िलाफ़ काम करना होता है जो पत्रकारों के सवाल उठाने के काम पर पाबन्दी लगाना चाहते हैं. महासचिव बान की मून ने चिन्ता जताते हुए कहा कि पूरी दुनिया में पत्रकारों को निशाना बनाया जाता है.

परम्परागत रेडियो, प्रिन्ट और टेलीविज़न से लेकर सोशल मीडिया, ब्लॉग वग़ैरा क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों यानी सभी को निशाना बनाया जाता है. और ये ख़तरे सिर्फ़ शारीरिक नुक़सान के ही नहीं होते हैं बल्कि साईबर हमले भी होते हैं और पत्रकारों को नुक़सान पहुँचाने के लिए क़ानून बनाने की प्रक्रिया तक का भी दुरुपयोग किया जाता है.

इसमें बहुत से पत्रकारों को अपनी जान से ही हाथ धोना पड़ता है और सैकड़ों पत्रकारों को बन्दी बना लिया जाता है. बहुत से पत्रकार तो सिर्फ़ दिखावे के मुक़दमों के परिणामस्वरूप वर्षों तक बहुत ही ख़राब परिस्थितियों में जेलों में बन्द पड़े रहते हैं.

इस वर्ष तीन मई को विश्व प्रेस आज़ादी दिवस की बीसवीं वर्षगाँठ थी. यूनेस्को ने पत्रकारों और मीडिया कर्मियों की स्थिति की तरफ़ ध्यान आकर्षित करने की सिफ़ारिशें की थीं जिसके बाद ये दिवस मनाना शुरू किया गया.