13/04/2013

यौन हिंसा के दोषियों का ठिकाना नहीं, पाँच देशों में फाँसी की सज़ा धड़ल्ले से

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यौन हिंसा दोषियों के लिए कोई ठिकाना नहीं

संकट ग्रस्त स्थानों पर यौन हिंसा रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासचिव की विशेष प्रतिनिधि ज़ैनब बनगूरा ने कहा है कि यौन हिंसा करने वाले लोगों के लिए छुपने का कोई ठिकाना नहीं हो सकता और उन्हें न्याय के कटघरे में लाने के लिए सभी उपायों का सहारा लिया जाएगा.

ज़ैनब बनगूरा ने संकटग्रस्त स्थानों पर यौन हिंसा पर लन्दन में जी-8 देशों का घोषणा पत्र जारी होने के समय ये चेतावनी दी.

उन्होंने कहा कि जी-8 देशों के फ़ोरम से ये घोषणा-पत्र जारी होना एक पक्का इरादा दिखाता है. ग़ौरतलब है कि जी-8 दुनिया के सबसे धनी देशों का संगठन है.

ज़ैनब बनगूरा

ज़ैनब ने यौन हिंसा के दोषियों को सख़्त चेतावनी जारी की

ज़ैनब बनगूरा ने कहा, "ज़ैनब बनगूरा कह रही थीं कि संकटग्रस्त देशों में यौन हिंसा को क़तई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. ऐसे अपराधों के लिए ज़िम्मेदार लोगों को न्याय के कटघरे में लाने के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की पूरी ताक़त का इस्तेमाल किया जाएगा."

"यौन हिंसा के ज़िम्मेदार लोगों के लिए छुपने का कोई ठिकाना नहीं हो सकता, ना ही उन्हें माफ़ी मिल सकती है और ना ही उन्हें कहीँ सुरक्षित पनाह मिल सकती है."

ज़ैनब बनगूरा ने चेतावनी के अंदाज़ में कहा कि हम अपनी पूरी और एकजुट ताक़त के साथ उनका पीछा करेंगे.

"इस प्रक्रिया में हम यौन हिंसा के शिकार लोगों की व्यथा, यौन हिंसा के ज़िम्मेदार लोगों पर पर डाल देंगे लेकिन उन्हें छोड़ेंगे नहीं."

ज़ैनब काँगो गणराज्य और सोमालिया की अपनी पहली यात्रा से वापसी के दौरान लन्दन रुकी थीं.

इन देशों में बड़ी संख्या में महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले हुए हैं. कुछ मामलों में तो बहुत ही छोटी उम्र की लड़कियों को भी नहीं बख़्शा गया है.

ज़ैनब ने कहा कि जी-8 देशों में जारी किए गए इस घोषणा पत्र से उम्मीद की किरण नज़र आई है जिससे बहुत से समुदायों और महिलाओं को सहारा मिलेगा.

सीरिया की हालत बहुत नाज़ुक

बराक ओबामा ने वाशिंगटन स्थित व्हाइट में संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून से गुरूवार को मुलाक़ात के बाद पत्रकारों से कहा कि उन्होंने इस मुलाक़ात में विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की.

बान की मून और बराक ओबामा

दोनों नेताओं ने सीरिया की हालत पर गम्भीर चिन्ता जताई

उन्होंने कहा कि बातचीत की शुरूआत सीरिया से हुई जहाँ, जैसाकि सभी जानते हैं कि मानवीय स्थिति बहुत गम्भीर हो गई है.

दोनों नेताओं में इस बात पर एक राय थी कि सीरिया बहुत ही नाज़ुक मोड़ पर पहुँच गया है, इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि एक राजनीतिक हल निकाला जाए जिसमें सत्ता हस्तांतरण का विकल्प भी शामिल हो और जिसमें सीरिया के लोगों के अधिकारों का सम्मान किया जाए.

उधर महासचिव बान की मून ने सीरिया के हालात को दिल दहला देने वाले बताते हुए कहा कि इसका हल निकालने के लिए दुनिया भर के नेताओं के मज़बूत नेतृत्व की सख़्त ज़रूरत है.

महासचिव बान की मून ने राष्ट्रपति बराक ओबामा से कहा है कि वो सीरिया संकट का हल निकालने के लिए सुरक्षा परिषद में अपने मज़बूत नेतृत्व प्रभाव का इस्तेमाल और प्रदर्शन करें.

महासचिव ने कहा कि सीरिया संकट का हल निकालने के लिए वो संयुक्त विशेष प्रतिनिधि लख़दर ब्राहमी के साथ लगातार काम कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे.

उन्होंने ये भी कहा कि यह बहुत ही दुर्भाग्य पूर्ण है कि सीरिया का संकट तीसरे वर्ष में प्रवेश कर गया है और इसके तुरन्त रुकने के आसार नज़र नहीं आते हैं.

उन्होंने कहा कि सीरिया संकट का कोई राजनीतिक समाधान नहीं निकाले जाने की वजह से वहाँ दो वर्षों में 70 हज़ार से भी ज़्यादा लोगों की जान जा चुकी है.

देश के लगभग आधे स्कूल और अस्पताल तबाह हो गए हैं, साथ ही बुनियादी ढांचे को भी भारी नुक़सान पहुँचा है.

इसराइली प्रतिबंधों से ग़ज़ा में हालात बहुत नाज़ुक

फ़लस्तीनी क्षेत्र ग़ाज़ा में सामान और लोगों की आवाजाही पर इसराइल द्वारा लगाई गई रोक से वहाँ, बहुत से लोगों का जीवन और नागरिक अधिकार बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.

ग़ाज़ा में संयुक्त राष्ट्र के मानवीय कार्यों के संयोजक जेम्स रॉवली ने ये चेतावनी जारी की है.

जेम्स रॉवली का कहना था कि अगर ये प्रतिबंध जारी रहे तो ग़ाज़ा में रहने वाले लोगों के जीवन पर व्यापक असर पड़ेगा.

संयुक्त राष्ट्र के उप प्रवक्ता एडुअर्डो डेल बुए ने और जानकारी देते हुए कहा कि इसराइल ने ख़राब होती सुरक्षा स्थिति के मद्देनज़र ग़ाज़ा पट्टी में और और वहाँ से, हाल के सप्ताहों में सामान और लोगों की आवाजाही पर रोक लगा दी है.

इन प्रतिबंधों के तहत केरेम शेलॉम नाका भी बंद कर दिया गया है जहाँ से सामान और लोगों की आवाजाही होती है.

उप प्रवक्ता के अनुसार जेम्स रॉवली ने बताया कि इसराइल द्वारा लगाए गए इन प्रतिबन्धों की वजह से ज़रूरी चीज़ों की कमी होने लगी है जिनमें खाने-पीने के सामान और खाना पकाने वाली गैस भी शामिल हैं.

उप प्रवक्ता एडुअर्डो डेल बुए ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र हालात सामान्य बनाने और युद्ध विराम समझौता लागू कराए रखने के मिस्र के प्रयासों का समर्थन करता रहेगा क्योंकि सिर्फ़ इसी तरीक़े से ग़ाज़ा में स्थिति को स्थिर बनाए रखा जा सकता है.

सिर्फ़ पाँच देशों में फाँसी की सज़ा धड़ल्ले से

अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इन्टरनेशनल ने कहा है कि सिर्फ़ गिने-चुने देश ही ऐसे हैं जो फाँसी की सज़ा बरक़रार रखे हुए हैं, अलबत्ता फाँसी दिए जाने के मामलों में बढ़ोत्तरी नहीं हुई है, हालाँकि चीन अपवाद है.

एमनेस्टी इन्टरनेशनल में अंतरराष्ट्रीय क़ानून की वरिष्ठ निदेशक विडनी ब्राउन ने न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में बुधवार को ये जानकारी दी.

मृत्यु दंड पर एमनेस्टी इन्टरनेशनल की वार्षिक रिपोर्ट पेश करते हुए विडनी ब्राउन ने कहा कि गत वर्ष और इस वर्ष जिन देशों में मृत्यु दंड दिया गया, उनकी संख्या 21 ही बनी हुई है.

Death penalty is frequent in 5 ccountries

पाँच देशों में धड़ल्ले से फाँसी की सज़ा अब भी दी जाती है

विडनी ब्राउन ने बताया कि इन 21 देशों में से पाँच ऐसे हैं जहाँ बड़ी संख्या में फाँसी की सज़ा दी जाती है और उनके नाम हैं – चीन, ईरान, इराक़, सऊदी अरब और अमरीका.

विडनी ब्राउन ने कहा कि कि ये पाँच देश साल दर साल ऐसे देशों की सूची में शीर्ष पर बने हुए हैं जहाँ फाँसी की सज़ा लगातार दी जाती रही है, हालाँकि इन देशों में भी सज़ा ए मौत के मामले कम हो रहे हैं.

"लेकिन इराक़ एक ऐसा देश है जहाँ सज़ा ए मौत देने के मामले वर्ष 2011 के मुक़ाबले इस वर्ष दो गुना हो गए हैं. हालाँकि इराक़ में भी अगर कुछ वर्ष पीछे जाएँ तो वहाँ भी सज़ा ए मौत देने के मामले इससे भी ज़्यादा होते थे."

विडनी ब्राउन के अनुसार इसलिए ये कहा जा सकता है कि सिर्फ़ कुछ ही देश हैं जहाँ मृत्यु दंड दिया जाता है और वहाँ मृत्यु दंड के समर्थन में भारी-भरकम तर्क दिए जाते हैं, यही हमारी चुनौती है कि इस रुख़ को बदला जाए.

उन्होंने कहा कि ऐसे बहुत से देशों की सरकारें ये तर्क देती हैं कि जिन लोगों पर वो शासन करते हैं, वो ही मृत्यु दंड का समर्थन करते हैं.

विडनी ब्राउन ने ज़ोर देकर कहा कि मृत्यु दंड एक ऐसी सज़ा है जिसके तहत एक बार दंड देने के बाद आदमी की ज़िंदगी वापिस नहीं लाई जा सकती.

ये तो तय बात है कि आदमी से ग़लतियाँ भी होती हैं और किसी ग़लती की वजह से अगर किसी बेक़सूर आदमी को फाँसी लगा दी जाए तो उसकी ज़िंदगी को फिर वापिस नहीं लाया जा सकता.

उन्होंने कहा कि इसलिए ये बहुत ज़रूरी है कि देशों की सरकारें ही मृत्यु दंड को समाप्त करने के लिए क़दम आगे बढ़ाएँ.

न्यूमोनिया और हैज़ा से मौतों को रोकने के लिए योजना

संयुक्त राष्ट्र की दो एजेंसियों ने अगले दस वर्षों में न्यूमोनिया और दस्त-पेचिस से होने वाली मौतें रोकने के लिए एक नई योजना शुरू की है.

यह योजना विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनीसेफ़ ने मिलकर तैयार की है जिसके तहत इन दो ख़तरनाक बीमारियों का सफ़ाया करने के लिए मिलकर प्रयास करने का आहवान किया गया है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि योजना का लक्ष्य हर वर्ष पाँच वर्ष से कम उम्र के बीस लाख से ज़्यादा बच्चों की जान बचाना है.

इसके लिए ज़रूरी दवाँए आसानी से उपलब्ध कराई जाएंगी, साथ ही बच्चों में पोषण बढ़ाने और स्वच्छ पर्यावरण को बढ़ावा देने के भी प्रयास किए जाएंगे.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की डॉक्टर एलिज़ाबेथ मैसन का कहना था कि बांग्लादेश, कम्बोडिया, इथियोपिया, मलावी, पाकिस्तान और तन्ज़ानिया में पहले ही इस तरह के कार्यक्रम के फ़ायदे नज़र आ रहे हैं.

उन्होंने कहा कि बच्चों का साधारण सा इलाज कराना बहुत महत्वपूर्ण है. इस इलाज में ऐसा नमक खिलाने की बात की जा रही है जिसकी क़ीमत चंद सिक्के होती है. ज़िंक भी सस्ता ही होता है और साथ में एंटीबॉयोटिक दी जा सकती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि हालाँकि दस्त-पेचिस और न्यूमोनिया ऐसी बीमारियाँ हैं जिन्हें रोका जा सकता है, फिर भी हर वर्ष इन बीमारियों से लगभग 70 लाख बच्चों की मौत हो जाती है, और ये ज़्यादातर विकासशील देशों में होता है.

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