29/03/2013

ब्रिक्स का सफलता अभियान, चमकदार भविष्य निर्माण का आहवान

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निवेश में ब्रिक्स देशों की बढ़ती भूमिका

संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन में पाया गया है कि ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका में – और वहाँ से बाहर – सीधे विदेशी निवेश लगातार बढ़ रहा है.

इन देशों के संगठन को ब्रिक्स के नाम से भी जाना जाता है.

संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन यानी अंकटाड का कहना है कि ब्रिक्स देशों में विदेशी निवेश गत वर्ष बढ़कर तीन गुना हो गया है जो 263 अरब डॉलर तक पहुँच गया.

इस बीच इन देशों से विदेशों में किया जाने वाला निवेश भी पूरी दुनिया में होने वाले विदेशी निवेश का दस प्रतिशत हो गया है.

वर्ष 2000 में ये निवेश सिर्फ़ सात अरब डॉलर था जो गत वर्ष बढ़कर 126 अरब डॉलर तक पहुँच गया.

अंकटाड की निवेश और उद्यम ईकाई के निदेशक जेम्स ज़्हान का कहना था कि ब्रिक्स समूह के देश दक्षिण अफ्रीका में निवेश लगातार बढ़ा रहे हैं, ख़ासतौर से निर्माण और सेवा क्षेत्रों में.

उनका कहना था कि मिसाल के तौर पर, अगर परियोजनाओं की कुल लागत देखी जाए तो, दक्षिण अफ्रीका में ब्रिक्स देशों से किया जाना वाला 32 प्रतिशत निवेश सेवा क्षेत्र में है और 42 प्रतिशत निर्माण क्षेत्र में.

ये अध्ययन रिपोर्ट 26 और 27 मार्च को डर्बन में हुए ब्रिक्स देशों के सम्मेलन के अवसर पर जारी की गई थी.

बेहतरीन भविष्य निर्माण के लिए युवाओं का आहवान

संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद यानी ईकोसॉक ने विज्ञान और प्रोद्योगिकी के ज़रिए होने वाले आविष्कार और विकास पर विचार करने के लिए न्यूयॉर्क में बुधवार को एक दिन का सम्मेलन आयोजित किया.

सम्मेलन में अनेक देशों से ऐसे युवाओं ने हिस्सा लिया जो इंटरनेट बिज़नेस, सोशल मीडिया और मेडिकल अनुसंधान जैसे क्षेत्रों के विशेषज्ञ थे.

एक इंटरनेट विशेषज्ञ वाएल ग़ोनिम मिस्र में वर्ष 2011 में हुए लोकतंत्र समर्थक आंदोलन और प्रदर्शनों में शामिल रहे हैं जिनमें इंटरनेट और सोशल मीडिया की अहम भूमिका रही है. वाएल ग़ोनिम का कहना था, "मेरा संबंध अरब क्षेत्र से है और वहाँ जो परिवर्तन आया है वो इस वजह से कि पिछले एक दशक के दौरान संचार और प्रोद्योगिकी क्षेत्र में खुलापन देखा गया है.”

“इन क्षेत्रों में विकास और खुलेपन की बदौलत अब लोग खुलकर एक दूसरे के साथ सम्पर्क स्थापित कर रहे हैं और एकजुट हो रहे हैं. सरकारें इस बदलाव और प्रगति को समझने में ज़रा सुस्त रहीं हैं और वो इस प्रगति के अनुसार ख़ुद को ढाल भी नहीं पाईं. इसलिए युवाओं में इस स्थिति के लिए बहुत ग़ुस्सा और निराशा पैदा हो गए. लेकिन सरकारें फिर भी स्थिति की गंभीरता से अनजान बनी रहीं और नतीजा ये हुआ जो पिछले कुछ वर्षों के दौरान हम सबने देखा है.”

उन्होंने कहा कि संचार और प्रोद्योगिकी क्षेत्रों में हुए विकास की बदौलत अरब क्षेत्र में इसी तरह से बदलाव जारी रहेगा.

सम्मेलन में भाग लेने वालों में उगांडा की एक महिला भी शामिल थी जिसने प्रोद्योगिकी क्षेत्र में महिलाओं के लिए एक ग़ैर सरकारी संगठन बनाया था.

साथ ही भारत में सोशल मीडिया के ज़रिए परिवर्तन लाने के प्रयास करने वाले कार्यकर्ताओं ने भी इस सम्मेलन में हिस्सा लिया.

बर्मा में साम्प्रदायिक हिंसा से प्रभावित क्षेत्र का दौरा

संयुक्त राष्ट्र के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बर्मा के केंद्रीय शहर मीकतिला का विशेष दौरा किया है जहाँ हाल ही में बौद्धों और मुसलमानों के बीच हुए साम्प्रदायिक दंगों में कम से कम तीस लोगों की मौत हो गई.

बर्मा मामलों पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव के विशेष सलाहकार विजय नाम्बियार ने मंगलवार को न्यूयॉर्क में पत्रकारों को बताया कि जब हिंसा शुरू हुई तो वो उस शहर में ही मौजूद थे.

विजय नाम्बियार ने बताया कि उन्होंने सरकार की अनुमति से प्रभावित इलाक़ों का दौरा किया और प्रभावितों से मुलाक़ात की. इन दंगों में ज़्यादातर मुसलमान ही प्रभावित हुए हैं और वो अब अस्थाई शिविरों में रह रहे हैं.

थाईलैंड से फ़ोन के ज़रिए विजय नाम्बियार ने कहा, "यहाँ स्थिति कई तरह से बहुत ख़राब है और लोग बहुत डरे और सहमे हुए हैं. एक बात जो मुझे अचरज में डालने वाली थी कि यहाँ के मुसलमानों को इस स्थिति की उम्मीद नहीं थी.”

विजय नाम्यबियार ने कहा कि यहाँ के मुसलमान अपने बौद्ध पड़ोसियों के साथ पीढ़ियों से रहते आए हैं, इसलिए उन्हें ये समझने में बहुत देर लगी कि ऐसी हिंसा कैसे हो सकती है. जिन लोगों से मैंने बातचीत की है उनमें से ज़्यादातर ने यही कहा कि हमले ऐसे लोगों ने किए जिन्हें वो पहचानते नहीं थे और हो सकता है कि हमलावर बाहर से आए हों.

“लेकिन यह स्पष्ट और तय नज़र आया कि इस हिंसा में मुसलमानों को ही निशाना बनाया गया, इसलिए प्रभावित होने वाले ज़्यादातर मुसलमान ही थे. और ऐसा लगता है कि इस हिंसा को बेहद क्रूरता के साथ अंजाम दिया गया."

बर्मा पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव के विशेष सलाहकार विजय नाम्बियार ने कहा कि बर्मा अधिकारियों ने इन हमलों के सिलसिले में 20 से ज़्यादा लोगों को पकड़ा है और जाँच-पड़ताल जारी है.

नाम्बियार ने कहा कि उन्होंने बर्मा के राष्ट्रपति थियेन शीन से भी मुलाक़ात की. राष्ट्रपति ने भरोसा दिलाया कि इस तरह की हिंसा फिर होने से रोकने के लिए सख़्त क़दम उठाए जाएंगे.

सीरिया में रसायनिक हथियारों के कथित प्रयोग के लिए जाँच मिशन

स्वीडन के एक प्रख्यात वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर अके सेल्सट्रॉम संयुक्त राष्ट्र के उस जाँच मिशन की अध्यक्षता करेंगे जो सीरिया में रासायनिक हथियारों के कथित इस्तेमाल के आरोपों की जाँच करेगा.

प्रोफ़ेसर एके सेल्सट्रॉम स्वीडिश अनुसंधान संस्थान के परियोजना मैनेजर हैं जो रासायनिक, जैविक, रेडियोएक्टिव, परमाणु और विस्फोटक सामग्री के बारे में अनुसंधान करता है और शिक्षा भी मुहैया कराता है.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने मंगलवार को एक वक्तव्य के ज़रिए ये घोषणा की.

प्रोफ़ेसर अके सेल्सट्रॉम ने संयक्त राष्ट्र रेडियो के साथ बातचीत में कहा कि ये ज़िम्मेदारी मिलने पर वो सम्मानित महसूस कर रहे हैं,

"मेरा ख़याल है कि तैयारी के लिए हमारे पास तीन-चार दिन का समय है. तीन या चार दिन निरीक्षण के लिए मिलेंगे.”

उन्होंने कहा कि रसायन विश्लेषण और रिपोर्ट लिखने के लिए दो से तीन सप्ताह तक का समय मिलेगा."

प्रोफ़ेसर सेल्सट्रॉम संयुक्त राष्ट्र के साथ विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं. साथ ही वो अमरीका में अनेक विश्वविद्यालयों में शिक्षण कार्य कर चुके हैं और स्वीडन के रक्षा और सुरक्षा अनुसंधान संस्थान में निदेशक भी रह चुके हैं.

अफ़ग़ानिस्तान के लिए अन्तरराष्ट्रीय सहायता का संकल्प

अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र मिशन के अध्यक्ष जैन कूबिस ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय अफ़ग़ानिस्तान की सहायता के लिए संकल्पबद्ध है.

संयुक्त राष्ट्र सहायता दूत ने राजधानी काबुल में बुधवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अफ़ग़ानिस्तान को अगले वर्ष होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनावों तक लघु अवधि की सहायता जारी रहेगी, साथ ही उसके बाद दीर्घकालीन सहायता भी जारी रहेगी.

जैन कूबिस ने पिछले सप्ताह ही न्यूयॉर्क में सुरक्षा परिषद की एक बैठक में भी हिस्सा लिया था.

उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद की बैठक में विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने अफ़ग़ानिस्तान के लिए सहायता जारी रखने के संकल्प वाले संदेश दिए जिनसे उनका हौसला बढ़ा है.

अफ़ग़ानिस्तान में तथाकथित पूर्ण बदलाव दशक के लिए ज़ोर शोर से तैयारियाँ चल रही हैं जो वर्ष 2015 से शुरू होगा.

अफ़ग़ानिस्तान में तैनात विदेशी सेनाएँ अगले वर्ष के अंत तक वहाँ से वापिस चली जाएंगी. साथ ही अफ़ग़ान सरकार भी विकास की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर उठाने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर काम कर रही है.

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