22/03/2013

ख़ुश रहने का दिन, नस्लभेद ख़ात्मे का आहवान

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एक माँ अपने बच्चे के साथ प्रसन्नता व्यक्त करती हुई

हर इन्सान अपने और अपनों के लिए प्रसन्नता चाहता है

बीस मार्च को अंतरराष्ट्रीय प्रसन्नता दिवस मनाया गया

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसके लिए गत वर्ष सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया जिसे नाम दिया गया था – Happiness: towards a holistic approach to development”.

सदस्य देशों ने प्रसन्नता की तलाश करने की कोशिश को एक वैश्विक आकांक्षा क़रार दिया जिसमें सहस्राब्दि विकास लक्ष्य यानी एमडीजी की आत्मा नीहित है. “The World Book of Happiness” नामक पत्रिका के संपादक लियो बॉरमन्स ने अपने शोध के दौरान पाया कि कुछ ऐसे भी प्रोफ़ेसर हैं जो बाक़ायदा प्रसन्नता का अध्ययन करते हैं.

लियो बॉरमन्स से जब ये पूछा गया कि प्रसन्नता पर यह पुस्तक लिखने के लिए उन्हें प्रेरित करने वाले कारक क्या थे, तो उनका कहना था, "हर कोई प्रसन्नता की तलाश में है क्योंकि हर कोई ख़ुश रहना चाहता है, अपने परिवार और बच्चों को ख़ुश देखना चाहता है. लेकिन सवाल ये है कि प्रसन्नता आख़िर है क्या. प्रसन्नता के बारे में हमारे मानक क्या हैं. इसलिए मैंने प्रसन्नता के बारे में मनोवैज्ञानिकों से जानकारी हासिल की.”

“हम जानते हैं कि ज़िन्दगी हर दिन पार्टी करने का नाम नहीं है, इसमें समस्याएँ होती हैं और उदासी भी आती है. इसलिए मैंने इस पुस्तक में ये बताने की कोशिश की है कि प्रसन्नता के बारे में आम आदमी के विश्वास और विचार क्या होते हैं. इस बात पर ज़ोर देने की ज़रूरत है कि सभी तरह के लोग प्रसन्नता को प्राथमिकता बनाएँ तो ज़िन्दगी ख़ूबसूरत बन सकती है."

प्रसन्नता के लिए संयुक्त राष्ट्र का विशेष दूत होने के नाते उन्होंने कहा कि जिस देश और समाज में लोगों के मानवाधिकार सुनिश्चित नहीं किए जा सकते, वहाँ लोग ख़ुश नहीं रह सकते.

ग़रीबी और हिंसक वातावरण से शिक्षा को नुक़सान पर चिन्ता

बच्चों का जीवन संवारने के लिए शिक्षा एक अहम कुंजी है. लेकिन भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में ग़रीबी और हिंसक वातावरण की वजह से शिक्षा को व्यापक नुक़सान हो रहा है.

शिमरीकॉन लुईथुई अरनी भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में एक नगा जातीय संगठन की सदस्य हैं.

उनका कहना है कि भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में व्यापक स्तर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है.

ग़ौरतलब है कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में नगा पृथकता आंदोलन भी चल रहा है. शिमरीकॉन लुईथुई अरनी का कहना है कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में बच्चों को शिक्षा के लिए भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है और शिक्षा हासिल करने की आकांक्षा रखने वाले बच्चे अक्सर या तो बंदीगृहों में पहुँच जाते हैं या फिर बंधुआ मजदूर बना दिए जाते हैं.

शिमरीकॉन लुईथुई अरनी बताती हैं कि संयुक्त राष्ट्र की वित्तीय मदद, एशिया इंडीजेनस पीपुल्स पैक्ट और भारत के समाज कल्याण मंत्रालय के संयुक्त प्रयासों की बदौलत एक ज़िले में लगभग 200 बच्चों को ऐसी बंधुआ मज़दूरी या बंदीगृहों से छुड़ाकर उनका पुनर्वास किया जा सका है.

इराक़ में राजनीतिक स्थिति विस्फोटक

इराक़ी शरणार्थी हिंसा और अस्थिरता से बहुत परेशान हैं

इराक़ में संयुक्त राष्ट्र मिशन के अध्यक्ष मार्टिन कॉबलर ने कहा है कि इराक़ में हालात बहुत विस्फोटक हैं और वहाँ लाखों-करोड़ों लोगों को अपनी बात कहने के लिए सड़कों पर इकट्ठा होना पड़ता है.

इतना ही नहीं, सरकार के कुछ मंत्री भी कैबिनेट बैठकों का बहिष्कार कर रहे हैं.

मार्टिन कॉबलर ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक बैठक में ये जानकारी देते हुए कहा कि पश्चिमी प्रांतों में गत दिसंबर से ही लोग मानवाधिकार और बुनियादी सेवाओं के मुद्दों पर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं.

इराक़ मिशन के मुखिया मार्टिन कॉबलर का कहना था कि प्रदर्शनकारी ख़ुद को असुरक्षित, वंचित और अलग-थलग महसूस करते हैं, "मैंने और मेरे सहयोगियों ने रमादी, समारा, मूसल, फ़लूजा, तिकरित, किरकुक में ख़ुद हालात देखे हैं. देश के विभिन्न हिस्सों में हमने प्रदर्शनकारियों की हताशा को देखा और सुना है."

"समय बीतने के साथ-साथ उनकी आवाज़ में ग़ुस्सा और नाराज़गी बढ़ती गई है और अब वो विकल्प और समाधान भी बहुत बाग़ी क़िस्म के सुझाने लगे हैं. सड़कों पर लोगों में जो ये ग़ुस्सा नज़र आता है वैसी ही स्थिति राजनीतिक गलियारों में भी है."

मार्टिन कॉबलर का कहना था, "इराक़िया गुट के सुन्नी मुस्लिम मंत्रियों ने कैबिनेट की बैठकों का तीन महीनों से लगातार बहिष्कार जारी रखा हुआ है. राजनीतिक गठबंधन कमज़ोर पड़ रहे हैं. सारांश ये है कि इराक़ में राजनीतिक पटल तार-तार होता नज़र आ रहा है."

उन्होंने कहा कि इराक़ सरकार ने प्रदर्शनकारियों की मांगों पर ध्यान देने के लिए कुछ क़दम उठाए हैं जिनके कुछ सकारात्मक परिणाम भी हासिल हुए हैं.

मार्टिन कॉबलर ने सुरक्षा परिषद को बताया कि इराक़ सरकार के इन प्रयासों के तहत लगभग तीन हज़ार 400 क़ैदियों को रिहा भी किया गया है.

मार्टिन कॉबलर ने कहा कि महिला क़ैदियों को उनके गृह प्रान्तों में भेज दिया गया है जहाँ वे बाक़ी की जेल अवधि काटेंगी.

श्रीलंका के मानवाधिकार रिकॉर्ड की निन्दा

श्रीलंका के मानवाधिकार रिकॉर्ड की ख़ासी आलोचना हुई है

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने श्रीलंका के मानवाधिकार रिकॉर्ड की निन्दा करने वाला एक प्रस्ताव पारित किया है. अमरीका द्वारा लाए गए इस प्रस्ताव में श्रीलंका सरकार का आहवान किया गया है कि वो अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून और अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के उल्लंघन के आरोपों की निष्पक्ष और भरोसेमन्द जाँच कराए.

अमरीकी राजदूत इलीन चैम्बरलेन ने कहा कि श्रीलंका के मानवाधिकार रिकॉर्ड में हुई प्रगति का भी ज़िक्र प्रस्ताव में किया गया है लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी और ज़रूरी है.

उन्होंने कहा, "श्रीलंका सरकार सुलह-सफ़ाई और जवाबदेही तय करने के लिए सार्थक कार्रवाई करनी होगी. साथ ही मानवाधिकारों की स्थिति में लगातार आ रही गिरावट पर चिंताओं को दूर करने के लिए भी ठोस क़दम उठाने होंगे."

इलीन चेम्बरलेन ने कहा कि श्रीलंका में मानवाधिकार उल्लंघन के जो मामले सामने आ रहे हैं उनमें लोगों का लापता होना, हत्याएँ होना, लोगों को प्रताड़ित किया जाना और अभिव्यक्ति और विचार व्यक्त करने के अधिकार का उल्लंघन, एक जगह इकट्ठा होकर शांतिपूर्ण तरीक़े से प्रदर्शन करने का अधिकार नहीं दिया जाना शामिल हैं.

मानवाधिकार परिषद में श्रीलंका के प्रतिनिधि महिन्दा समरसिन्घे ने सदस्यों को इस प्रस्ताव के विरोध में मतदान करने के लिए मनाने की ज़ोरदार कोशिश करते हुए कहा कि जिनको भी श्रीलंका के लोगों के कुशलपूर्वक भविष्य की चिन्ता है उन्हें श्रीलंका को इस परिषद के अनुचित ध्यान का केंद्र बनाकर अलग-थलग करने के बजाय, उसके सुलह-सफ़ाई के प्रयासों में सहयोग देना और प्रोत्साहित करना चाहिए.

समरसिन्घे की कोशिशों के बावजूद 25 प्रतिनिधियों ने प्रस्ताव के समर्थन में और 13 सदस्यों ने विरोध में मतदान किया.

विरोध में मतदान करने वालों में इंडोनेशिया, पाकिस्तान, फ़िलीपीन्स और थाईलैंड शामिल थे. आठ प्रतिनिधियों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया.

खेलों में नस्लभेद उन्मूलन का आहवान

21 मार्च को नस्लभेद उन्मूलन के अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया गया है. नस्लभेद पर मानवाधिकार विशेषज्ञों ने एक प्रश्न प्रस्तुत किया कि – नस्लभेद को ख़त्म करने के लिए ठोस रूप में क्या किया जा सकता है.

मानवाधिकार विशेषज्ञों के इस समूह ने कहा कि नस्लभेद उन्मूलन का अंतरराष्ट्रीय दिवस विविधता का आनन्द उठाने का बेहतरीन मौक़ा है और इस दिन पर हम तमाम खिलाड़ियों, खेल अधिकारियों और खेल प्रेमियों से अनुरोध करते हैं कि वो खेलों में असहिष्णुता और नस्लभेद के ख़िलाफ़ सख़्त रुख़ अपनाएँ.

इन विशेषज्ञों का कहना था कि हर समाज में खिलाड़ी अपने बर्ताव के लिए रोल मॉडल का काम करते हैं क्योंकि खेल प्रमियों, ख़ासतौर से युवाओं पर उनका बहुत प्रभाव होता है.

उन्होंने कहा कि खेलों के ज़रिए मानव उपलब्धि और उत्कृष्टता पर ख़ुशी मनाने का चलन बढ़ना चाहिए और इसके लिए जाति, नस्ल और राष्ट्रीयता की सीमाओं को भी तोड़ देना चाहिए.

समूह ने कहा, "विभिन्न संस्कृतियों के आपसी संबंधों को बढ़ावा देने के लिए खेलों का इस्तेमाल करना चाहिए जिसका आधार समानता, एकजुटता और विविधता को सम्मान होना चाहिए."

मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि नस्लभेदी लोग दूसरों की बेइज़्ज़ती करते हैं जबकि खिलाड़ियों की दुनिया में हिंसा और भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए क्योंकि इनसे खेलों की भावना को नुक़सान पहुँचता है.

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