8/03/2013

विश्व महिला दिवस पर विश्व व्यापी चर्चा

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खेत में काम करती एक भारतीय महिला

भारत में बहुत सी महिलाओं को खेतों में भी मेहनत वाला काम करना पड़ता है

महिलाओं के ख़िलाफ़ तमाम तरह की हिंसा बंद करने का आहवान

तमाम देशों की सरकारों का आहवान किया गया है कि वे मतभेदों और अनिर्णय की स्थिति को महिलाओं की प्रगति में बाधा नहीं बनने दें.

महिलाओं के सशक्तिकरण को बढ़ावा देने और महिला-पुरुष समानता के लिए काम करने वाली एजेंसी – संयुक्त राष्ट्र महिला संगठन की अध्यक्ष मिशेल बेचलेट ने आठ मार्च को विश्व महिला दिवस पर ये आहवान किया.

मिशेल बेचलेट ने कहा कि दुनिया भर में महिला दिवस पर विशेष जागरूकता अभियान चलाए गए हैं, वहीं अनेक देशों की सरकारों के प्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं ने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आकर महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा बंद करने के समर्थन में आवाज़ उठाई है.

उन्होंने कहा कि विश्व महिला दिवस पर उनके संदेश के दो पक्ष हैं – उम्मीद और ग़ुस्सा. उम्मीद इसलिए कि महिलाओं के अधिकारों के लिए प्रयास और जागरूकता बढ़ी है, और ग़ु्स्सा इसलिए कि लड़कियों और महिलाओं को अब भी गंभीर भेदभाव और हिंसा का सामना करना पड़ रहा है.

मिशेल बेचलेट का कहना था, “आज और हर दिन हम यही कहते हैं कि और नहीं बस और नहीं. लड़कियों और महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा और भेदभाव अब बिल्कुल भी बर्दाश्त ना किया जाए.”

“महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली घरेलू हिंसा और दुर्व्यवहार भी बंद हो. किसी महिला का बलात्कार ना हो और कोई भी महिला यौन शोषण का शिकार ना बने. किसी भी महिला की तस्करी ना हो और किसी भी महिला को यौन गतिविधियों के लिए ग़ुलाम ना बनाया जाए.”

मिशेल बेचलेट ने कहा, “महिलाओं पर ज़ुल्म – और नहीं बस और नहीं. लेकिन हम शांति, मानवाधिकारों की संरक्षा, न्याय और समानता के लिए कंधे से कंधा मिलाकर भी खड़े हैं.”

संयुक्त राष्ट्र महिला संगठन की अध्यक्ष मिशेल बेचलेट ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का आहवान करते हुए कहा कि किसी भी तरह की हिंसा से प्रभावित होने वाली महिलाओं को सभी तरह की मदद और सेवाएँ मुहैया कराने के लिए एकजुट होकर काम करने में कोई हिचक ना रखी जाए .

‘महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा का मामला जीवन-मरण समान’

संयुक्त राष्ट्र के उप महासचिव जैन एलिएसन ने कहा है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को समाप्त करना जीवन-मरण का मुद्दा बन गया है.

भारत में खेल का आनंद लेती कुछ लड़कियाँ

भारत सहित अनेक देशों  बहुत सी महिलाओं को ऐसे पल कम ही नसीब होते हैं

महिलाओं की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र आयोग के न्यूयॉर्क में आयोजित 57वें सत्र में एलिएसन का कहना था कि हालाँकि महिलाओं के पास ताक़त और बढ़ रही है क्योंकि दुनिया भर में महिलाएँ अब शीर्ष पदों पर काम करने लगी हैं.

इस सत्र का मुख्य विषय लड़कियों और महिलाओं के ख़िलाफ़ तमाम तरह की हिंसा की रोकथाम और उसे ख़त्म करना था.

दुनिया भर में इस जारी इस हिंसा से लाखों-करोड़ों महिलाएँ परेशान हैं. उनकी आपबीती की दास्तान दिल दहला देने वाली है लेकिन उनका हौसला नहीं टूटा है.”

उप महासचिव जैन एलिएसन ने कहा कि इस समस्या का ठोस हल निकालने के लिए लड़कों और पुरुषों को महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा को बिल्कुल भी सहन नहीं करने के लिए प्रोत्साहित करना होगा. एक पखवाड़ा चलने वाले इस सत्र में दुनिया भर से अनेक महिला नेताओं और कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया है.

उधर भारत में संयुक्त राष्ट्र ने महिलाओं को हिंसा से मुक्ति दिलाने के विषय पर एक फोटो प्रतियोगिता का आयोजन किया जो पिछले वर्ष नौ दिसंबर से इस वर्ष दस फ़रवरी यानी क़रीब दो महीने तक चली.

इस प्रतियोगिता को लोगों में महिलाओं के अधिकारों के बारे में और उनके ख़िलाफ़ हिंसा बंद करने के प्रयासों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए एक अच्छा अवसर समझा गया. प्रतियोगिता में पुरस्कृत की गईं 13 तस्वीरों की एक प्रदर्शन दिल्ली के इंडिया हेबिटेट सेंटर में आयोजित की गई है जो छह से 18 मार्च तक चलेगी.

सीरियाई शरणार्थियों की संख्या दस लाख तक पहुँची

सीरिया में लगभग दो वर्षों से जारी हिंसा की वजह से पड़ोसी देशों में पनाह लेने वाले सीरियाई नागरिकों की संख्या दस लाख तक पहुँच गई है. संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी – यूएनएचसीआर (UNHCR) की रिपोर्ट के अनुसार इनमें लगभग आधी संख्या बच्चों की है जिनमें ज़्यादातर बच्चों की उम्र 11 वर्ष से कम है.

सीरियाई शरणार्थी

दो साल की हिंसा के दौरान दस लाख से ज़्यादा लोग पड़ोसी देशो को भाग गए हैं

एजेंसी का कहना है कि सिर्फ़ इसी वर्ष यानी 2013 में चार लाख सीरियाई नागरिक अपने ही देश में शरणार्थी बन चुके हैं. इनमें से ज़्यादातर ऐसे हैं जिनके परिजनों की मौत हो चुकी है. ये बहुत ज़्यादा डरे हुए हैं और इनके पास कुछ सामान भी नहीं बचा है. जिनेवा में यूएनएचसीआर के प्रवक्ता एड्रियन एडवर्ड्स का कहना था.

यूएनएचसीआर के प्रवक्ता एड्रियन एडवर्ड्स का कहना था, “ये भारी संख्या में लोगों के शरणार्थी बन जाने का मामला है. इसके अलावा इन शरणार्थियों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ी है. इस वर्ष के सिर्फ़ इन तीन महीनों में ही सीरियाई शरणार्थियों की संख्या दो गुनी हो गई है जो बढ़कर कुल दस लाख तक पहुँच चुकी है. इससे लोगों की मुश्किलों और सीरिया और पड़ोसी देशों में पैदा हो चुके संकट की स्थिति का अंदाज़ा होता है.”

एजेंसी का ये भी कहना है कि हिंसा से प्रभावित बहुत से सीरियाई लोगों ने लेबनान, जॉर्डन, तुर्की, इराक़ और मिस्र में पनाह ली है.

बुश कार्यकाल में सीआईए के आतंकवाद कार्यक्रम की जाँच की माँग

अमरीका से पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के कार्यकाल में ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के  - आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के संदिग्ध लोगों को गुप्त रूप से बंधक बनाने, उन्हें पूछताछ के लिए कमज़ोर क़ानूनों वाले देशों में भेजने और प्रताड़ित करने के मामलों की जाँच करने वाली एक रिपोर्ट को सार्वजनिक करने का आहवान किया गया है.

आतंकवाद का मुक़ाबला करने के अभियान के दौरान मानवाधिकार संरक्षा पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत बेन एमरसन ने ये आहवान किया है.

जिनेवा में मानवाधिकार परिषद को संबोधित करते हुए बेन एमरसन ने कहा कि बुश कार्यकाल में सीआईए की 'ग़ैर क़ानूनी गतिविधियों' के लिए जो भी लोग ज़िम्मेदार थे, उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई होनी चाहिए.

बेन एमरसन ने ये भी कहा कि इन प्रयासों के तहत पहले क़दम के रूप में सीआईए के उन कार्यक्रमों की जाँच करने वाली सीनेट समिति की ख़ुफ़िया रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए.

बेन एमरसन ने कहा, “पिछले दशक के दौरान सीआईए के अभियानों को समर्थन देने और उनमें अपना हाथ होने की बात छुपाने के लिए अमरीका सहित बहुत से देशों ने अथक प्रयास किए हैं. सीआईए के ये अभइयान अंतरराष्ट्रीय अपराध की श्रेणी में आते हैं. लेकिन इन गतिविधियों को आम लोगों की जाँच-पड़ताल से बचाने की अथक कोशिश के बावजूद ख़ामोशी की ये दीवार कमज़ोर साबित हुई है जिसे भेदना मुश्किल नहीं है.”

“बीते समय में किए गए फ़ैसलों और गतिविधियों के लिए ज़िम्मेदारी तय करने की रणनीति को समर्थन बढ़ रहा है. साथ ही, जो सरकारी अधिकारी अमरीका, यूरोप और अन्य देशों में इस वैश्विक अपराध नेटवर्क में शामिल रहे हैं उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई होनी चाहिए.”

बेन एमरसन ने ब्रिटेन सरकार का भी आहवान किया कि उस जाँच आयोग की अंतरिम रिपोर्ट प्रकाशित की जाए जो ये देखने के लिए गठित किया गया था कि ब्रिटेन की ख़ुफ़िया एजेंसियाँ आतंकवादी गतिविधियों के संदिग्ध लोगों को ब्रिटेन से बाहर बंदी बनाकर और प्रताड़ित करने के अभियान में शामिल रही हैं या नहीं, अगर हाँ, तो किस हद तक.

इसराइली हिरासत में फ़लस्तीनी बच्चों को बेहतर सुरक्षा की ज़रूरत

फ़लस्तीनी बच्चे

फ़लस्तीनी बच्चों के अधिकारों की संरक्षा की माँग की गई है

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष – यूनीसेफ़ (UNICEF) इसराइल की सैनिक हिरासत में रखे गए फ़लस्तीनी बच्चों की बेहतरी के लिए कुछ उपाय सुझाए हैं.

इन उपायों में ऐसे क़दम उठाने की सिफ़ारिश की गई है जिनके ज़रिए इसराइली सेना की हिरासत में मौजूद फ़लस्तीनी बच्चों के साथ अंतरराष्ट्रीय मानकों और संधियों के अनुसार बर्ताव को सुनिश्चित किया जा सके.

यूनीसेफ़ के इस प्रस्ताव पत्र में कहा गया है कि बच्चों की गिरफ़्तारी, रास्ते में और पूछताछ के दौरान बाल बंदियों के साथ बुरा बर्ताव करने किया जाता है.

यूनीसेफ़ के प्रस्ताव पत्र में सिफ़ारिश की गई है कि बच्चों की आँखों पर पट्टी बाँधने और उन्हें अलग-थलग रखने का चलन भी बंद होना चाहिए.

यूनीसेफ़ के प्रस्ताव पत्र में ये भी सिफ़ारिश की गई है कि बहुत ही असाधारण हालात के अलावा बच्चों को रात में गिरफ़्तार नहीं किया जाना चाहिए. और जब बच्चों से पूछताछ की जाए तो परिवार का कोई सदस्य या कोई वकील उनके साथ ज़रूर होना चाहिए.

यूनीसेफ़ ने हालाँकि पिछले कुछ वर्षों के दौरान इसराइली सेना की हिरासत में रखे जाने वाले फ़लस्तीनी बच्चों की हालत में हुए सुधार का स्वागत भी किया.

इन सुधारों में फ़लस्तीनी किशोरों की वयस्कता उम्र 16 से बढ़ाकर 18 वर्ष करना भी शामिल है.

यूनीसेफ़ ने कहा है कि इसराइली सेना की हिरासत में रखे जाने वाले फ़लस्तीनी बच्चों की हालत और अधिकारों में सुधार के इसराइली अधिकारियों के साथ सम्पर्क और प्रयास जारी रहेंगे.