1/03/2013

'सीरिया संकट और फ़लस्तीनी लोगों की मुश्किलें : दो बड़े मुद्दे'

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सीरिया में लड़ाई से प्रभावित एक बच्चा

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष संस्था – यूनीसेफ़ ने सीरिया में लगभग 70 बच्चों की मौत पर गहरी चिंता जताई है.

सीरिया के अलेप्पो के रिहायशी इलाक़ों में सोमवार 18 फ़रवरी और फिर शुक्रवार 22 फ़रवरी को मिसाइल हमले हुए थे जिनमें इन बच्चों की मौत हो गई.

युनीसेफ़ ने इन मिसाइल हमलों की कड़े शब्दों में निन्दा की है. साथ ही सभी पक्षों से ये सुनिश्चित करने का आहवान किया है कि हिंसा की स्थिति में आम नागरिक, ख़ासतौर से बच्चे पूरी तरह सुरक्षित रहें.

मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के लिए यूनीसेफ़ की क्षेत्रीय निदेशक मारिया कैलीविस ने एक वक्तव्य जारी करके कहा कि जबाल बदरो, तारीक़ अल बाब और अर्द अल हमरा रिहायशी इलाक़ों में भी चार अलग-अलग मिसाइल हमले हुए जिनमें अनेक आम लोगों की मौत हो गई.

इनके अलावा 21 फ़रवरी को राजधानी दमिश्क के बाहरी इलाक़े मज़रा में भी भीषण बम हमले हुए जिनमें साठ लोगों के मारे जाने की ख़बरें हैं. इनमें लगभग 20 बच्चे भी थे जो एक स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे.

यूनीसेफ़ ने कहा कि इन ताज़ा हमलों से नज़र आता है कि मौजूदा लड़ाई का कितना भयंकर असर आम लोगों पर हो रहा है, ख़ासतौर से बच्चों पर.

यूनीसेफ़ ने कहा है कि लगभग दो वर्षों से चल रहे इस संघर्ष को तुरंत रोकने की सख़्त ज़रूरत है क्योंकि ये सीरिया के सामाजिक ताने-बाने को बिल्कुल तहस-नहस कर रहा है.

'सीरिया में ख़ूनी लड़ाई और फ़लस्तीनी लोगों की मुश्किलें – दो बड़े मुद्दे'

संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष वुक जेरेमिच का कहना है कि पूरी दुनिया मध्य पूर्व में दो बहुत ही गंभीर समस्याओं से दो चार है और वो हैं – सीरिया में दो वर्षों से जारी ख़ूनी लड़ाई और फ़लस्तीनी लोगों की मुश्किलें.

संयुक्त राष्ट्र सभ्यता गठबंधन के जिनेवा में पाँचवे वैश्विक फ़ोरम में उन्होंने कहा कि उनके ख़याल में इन समस्याओं को जिस तरह से देखा जा रहा है उससे सभ्यताओं के बीच संवाद का तरीक़ा प्रभावित होगा.

महासभा अध्यक्ष ने आगाह करते हुए कहा कि ऐसी गंभीर स्थितियों में कुछ भी नहीं करना एक बड़े संकट के लिए खुला मैदान छोड़ने जैसा है. साथ ही हाथ पर हाथ धरे रहने की मनोस्थिति से संकट कम होने के बजाय और बढ़ेंगे.

महासभा के अध्यक्ष वुक जेरेमिच का कहना था, “सीरिया में गृह युद्ध की गंभीरता और भयावहता हाल के समय का सबसे बड़ा मानवीय संकट बन चुका है. ये यक़ीन करना मुश्किल लगता है कि सीरिया में इस ख़ूनी लड़ाई को दो वर्ष होने को आए हैं लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मानवीय संकट को रोकने या रुकवाने में नाकाम साबित हुआ है."

उन्होंने सीरिया में लड़ाई तुरंत बंद करने का आहवान करते हुए ज़ोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए फिलहाल तो यही लक्ष्य सबसे अहम होना चाहिए.

फ़लस्तीनी लोगों के अधिकारों के बारे में अध्यक्ष ने कहा कि पिछले क़रीब 70 वर्षों ये मुद्दा संयुक्त राष्ट्र के एजेंडा पर एक खुले ज़ख़्म की तरह रहा है जिससे लगातार रक्तस्राव भी हो रहा है. उन्होंने कहा कि ये दुनिया की भीषणतम ग़लतियों में से एक है और इसका तुरंत हल निकाला जाना बेहद ज़रूरी है.

अध्यक्ष वुक जेरेमिच ने उम्मीद जताई कि इसराइल और फ़लस्तीनी दोनों ही पक्ष जल्दी ही सदभावना के इरादे से बातचीत शुरू करेंगे और समस्या का हल निकालने के लिए ठोस प्रयास करेंगे.

 मानवाधिकार सबसे ऊपर रखे जाएँ – नवी पिल्लई

नवी पिल्लई

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त नवी पिल्लई ने कहा है कि वर्ष 2012 मानवाधिकार स्थिति के लिए बहुत ख़राब रहा है.

जिनेवा में मानवाधिकार परिषद में अपनी वार्षिक रिपोर्ट पेश करते हुए नवी पिल्लई ने कहा कि सीरिया, माली, सहेल, फ़लस्तीन और कांगो गणराज्य क्षेत्रों में जारी हिंसा और संकट की वजह से हज़ारों लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा है, भारी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं और बड़े पैमाने पर लोगों के मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ है. चिंता की बात ये है कि क़ानून डर कम हुआ है.

नवी पिल्लई ने कहा कि मिस्र, लीबिया, ट्यूनीशिया और यमन की स्थितियाँ दिखाती हैं कि अचानक से हुए सामाजिक और राजनीतिक बदलाव कोई आसान काम नहीं है, लोकतंत्र और मानवाधिकारों के लिए अनुकूल टिकाऊ परिस्थितियाँ बनाने के लिए बहुत प्रयास करने की ज़रूरत है.

आर्थिक संकट के असर का ज़िक्र करते हुए नवी पिल्लई ने कहा कि समाज के सबसे ग़रीब और अलग-थलग पड़े लोगों को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. साथ ही अनेक देशों में जो बचत उपाय लागू किए गए हैं उनसे बहुत से लोगों को आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों का लाभ उठाने पर बहुत नकारात्मक असर पड़ा है.

नवी पिल्लई ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय जो भी काम कर रहे हैं उनका मुख्य उद्देश्य मानवाधिकार ही होने चाहिए,  "लोगों की भलाई को सबसे ऊपर रखा जाना बेहद ज़रूरी है. सशस्त्र संघर्ष से लेकर आर्थिक संकट तक जो भी चुनौतियाँ मौजूद हैं उनके लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के ठोस प्रयासों की सख़्त ज़रूरत है.”

“ऐसे किसी भी प्रयासों का मुख्य उद्देश्य मानवाधिकार सुनिश्चित करना होना चाहिए और ये गंभीरता अंतरराष्ट्रीय संगठनों के फ़ैसलों में भी झलकनी चाहिए. इतना ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र के तमाम कार्यों में भी ये नज़र आना चाहिए क्योंकि इस विश्व संगठन का यही मुख्य लक्ष्य और उद्देश्य है. "

मानवाधिकार उच्चायुक्त की वार्षिक रिपोर्ट में पुरुष-महिला समानता और महिलाओं को अधिकारों को बढ़ावा देने, लोगों में भेदभाव ख़त्म करने के लिए क़ानून बनाने पर ज़ोर देने और अन्य मानवाधिकार मुद्दों के बारे में भी उपायों का ज़िक्र किया गया है.

रिपोर्ट में इस पर भी ज़ोर दिया गया है कि संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों और विशेष शांति मिशनों में मानवाधिकारों को भी शामिल किया जाए. साथ ही संकट की स्थितियों में संयुक्त राष्ट्र की तुरंत कार्रवाई करने की क्षमता में सुधार करने का भी आहवान किया गया है.

क़रीब डेढ़ अरब लोग हिंसाग्रस्त इलाक़ों में रहने को मजबूर

मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स (MDG) यानी सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों को हासिल करने की समय सीमा 2015 बहुत नज़दीक नज़र आ रही है लेकिन अब भी क़रीब डेढ़ अरब लोग अस्थिर और हिंसा से प्रभावित देशों में रहने को मजबूर हैं.

एशिया और प्रशांत के लिए संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक आयोग यानी एस्कैप (ESCAP) के अध्यक्ष डॉक्टर नोएलीन हेयज़ेर ने सभी के लिए आर्थिक विकास सम्मेलन में ये बात कही है जो तिमोर लेस्टे के दिली में बुधवार को सम्पन्न हुआ.

सम्मेलन में 400 से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. डॉक्टर हेयज़ेर का कहना था कि अब भी समय है कि सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आख़िरी कोशिश की जा सकती है.

डॉक्टर नोएलीन हेयज़ेर ने ये भी कहा कि साथ ही ये भी बहुत ज़रूरी है कि 2015 से आगे का जो एजेंडा बने उसमें हिंसा और संघर्ष से प्रभावित देशों और छोटे द्वीप देशों में रहने वाले लोगों की चिंताओं और मुद्दों को अहम जगह मिले.

उनका कहना था कि न्याय और क़ानूनी वैधता जैसी इन चिंताओं और मुद्दों को सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों में समुचित स्थान और ध्यान नहीं मिला था, “हिंसाग्रस्त अस्थिर देशों और नाज़ुक हालात में रहने वाले ये क़रीब डेढ़ अरब लोग इसलिए पीछे छूट गए हैं क्योंकि उनकी परिस्थितियों पर ग़ौर नहीं किया गया है. इसलिए ग़लतियों को सही करने और उनसे सबक़ सीखने के लिए हमारे पास बहुत सही मौक़ा है.”

“हम सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों को हासिल करने के अपने वादों को अब भी पूरा कर सकते हैं. इसके लिए हमें इन डेढ़ अरब लोगों के मुद्दों को 2015 से आगे के विकास एजेंडा में प्रमुखता से स्थान देना होगा.”

उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों को टिकाऊ विकास पर भी ध्यान देना होगा क्योंकि लोगों के लिए कामकाज और नौकरियों के अवसर पैदा करना बहुत अहम है, ख़ासतौर से युवाओं के लिए.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि विकास के बिना ना तो टिकाऊ शांति क़ायम रह सकती है और ना ही स्थिरता.

विभाजन और नफ़रत के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का आहवान

बान की मून

संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने विश्व भर के युवाओं का आहवान किया है कि सारी दुनिया सहिष्णुता और सम्मान की भाषा बोलने और सुनने के लिए युवाओं की तरफ़ देखती है.

सभ्यताओं पर संयुक्त राष्ट्र के गठबंधन के पाँचवें फ़ोरम को संबोधित करते हुए महासचिव ने ये बात कही.

ये फ़ोरम ऑस्ट्रिया की राजधानी वियेना में हुआ. महासचिव बान की मून ने कहा कि युवाओं की सहिष्णुता और सम्मान वाली भाषा उन लोगों तक पहुँचना ज़रूरी है जो विभाजन और नफ़रत की हिमायत देते हैं.

उन्होंने कहा कि टिकाऊ विकास और सदभावना के रास्ते पर चलने के लिए सारी दुनिया युवाओं के साहसिक और सैद्धांतिक कार्यकलापों पर भरोसा करेगी.

महासचिव ने ज़ोर देकर कहा कि युवाओं के साथ मिलकर काम करना संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था की प्राथमिकता है. साथ ही उनके दूसरे कार्यकाल के पाँच वर्षीय एजेंडा का भी, “महासचिव बान की मून कह रहे थे कि हम युवाओं से सीखना चाहते हैं और उनसे प्रेरणा हासिल करना चाहते हैं. हम युवाओं के जीवन में सुधार लाना चाहते हैं, युवा समुदायों और आज की दुनिया का ख़ास ख़याल रखना चाहते हैं. साथ मिलकर हम ज़्यादा समृद्ध, समान और शांतिपूर्ण भविष्य बना सकते हैं. लेकिन इसके लिए युवाओं के सक्रिय सहयोग की ज़रूरत है.”

“इसलिए मैं आज इस फ़ोरम से युवाओं का आहवान करता हूँ कि वे हम सबका मार्ग दर्शन करें. विश्व आज बड़े बदलावों के दौर से गुज़र रहा है जिनमें आर्थिक, जनसांख्यिक, राजनीतिक और पर्यावरण परिवर्तन शामिल हैं. हम समझते हैं कि चुनौतियाँ बहुत बड़ी हैं लेकिन अवसर भी तो बहुत बड़े हैं. बशर्ते कि हम अतिवाद और विभाजनकारी प्रवृत्तियों से मुँह मोड़ लें. किसी भी तरह का संघर्ष विकास के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है."

उन्होंने ये भी कहा कि ग़रीबी दूर करने और लोगों का जीवन और इस पृथ्वी को बेहतर बनाने के लिए हम सभी को मिलकर काम करना होगा. उन्होंने युवाओं से कहा कि उनका सक्रिय योगदान, ऊर्जा, आदर्शवाद और गतिविधियों की बहुत ज़रूरत है और हम सभी मिलकर काम करेंगे तो विकास लक्ष्य आसानी से हासिल किए जा सकते हैं.