29/03/2014

श्रीलंका गृहयुद्ध की जाँच हो

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संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने श्रीलंका में वर्ष 2009 के अन्त में समाप्त हुए गृह युद्ध के अन्तिम चरण के दौरान मानवाधिकार उल्लंघन मामलों की बिल्कुल निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीक़े से जाँच के लिए हरी झंडी दी है.

परिषद ने एक प्रस्ताव पारित करके मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय को ये अधिकार दिया है कि वो श्रीलंका के गृह युद्ध के दौरान सरकार और तमिल विद्रोहियों के हाथों हुए मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों की व्यापक जाँच करवाए और उसकी प्रगति की लगातार निगरानी भी करे.

ये प्रस्ताव अमरीका ने पेश किया था परिषद के 23 सदस्यों ने प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया जबकि 12 सदस्य देशों ने प्रस्ताव के विरोध में वोट दिया.

प्रस्ताव का विरोध करने वाले देशों में चीन, क्यूबा और पाकिस्तान शामिल थे. 12 सदस्य देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त नवी पिल्लई ने कहा कि हालाँकि श्रीलंका सरकार ने मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों की जाँच के लिए कुछ व्यवस्थाएँ की हैं लेकिन कोई भी जाँच इतनी स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं रही कि उनसे गृह युद्ध के प्रभावित लोगों और चश्मदीद गवाहों में भरोसा बहाल हो सके.

उन्होंने कहा कि इस तरह की जाँच एक स्वतंत्र अन्तरराष्ट्रीय आयोग के ज़रिए ही सुनिश्चित की जा सकती है.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को सौंपी अपनी रिपोर्ट में नवी पिल्लई ने चिन्ता जताते हुए कहा है कि श्रीलंका में मानवाधिकार की हिफ़ाज़त करने की कोशिश करने वालों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित किया जा रहा है.

इतना ही नहीं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता यानी विचार व्यक्त करने की आज़ादी को भी दबाया जा रहा है.

नवी पिल्लई का कहना था, "संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने श्रीलंका सरकार को जवाबदेही और सुलह-सफ़ाई का एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए तकनीकी सहायता देने की कई बार पेशकश की लेकिन श्रीलंका सरकार ने एक बार भी सकारात्मक जवाब नहीं दिया.

"गृह युद्ध के दौरान हुई हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघन के प्रभावत लोगों की परेशानियों और तकलीफ़ों पर अगर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता है तो इससे सरकार में लोगों का भरोसा कम होगा. साथ ही सुलह-सफ़ाई और मेलमिलाप की कोशिशें भी कामयाब नहीं होंगी.”

उन्होंने कहा,  ”हाल के वर्षों में देखा गया है कि श्रीलंका सरकार ने मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों की जाँच कराने के लिए कुछ व्यवस्थाएँ तो की थीं लेकिन कोई भी जाँच इतनी स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं रही कि प्रभावितों का भरोसा जीतने में कामयाब हो सकें."

नवी पिल्लई ने कहा, "ऐसे ताज़ा सबूत भी लगातार सामने आ रहे हैं और बहुत से चश्मदीद गवाह किसी अन्तरराष्ट्रीय जाँच आयोग के सामने अपने बयान दर्ज कराने के लिए तैयार हैं, बशर्ते कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए."

"इससे साबित होता है कि अन्तरराष्ट्रीय जाँच की ना सिर्फ़ ज़रूरत है बल्कि ये पूरी तरह सम्भव भी है. पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष अन्तरराष्ट्रीय जाँच के ज़रिए ही उस सच को सामने लाया जा सकता है जिसे श्रीलंका सरकार द्वारा कराई गई जाँच ज़ाहिर नहीं कर पाई है." नवी पिल्लई

उधर जिनेवा में श्रीलंका के प्रतिनिधि रवीनाता आर्यसिन्हा ने इस प्रस्ताव का ज़ोरदार विरोध किया.

उनका कहना था कि ये प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र के एक सदस्य देश यानी श्रीलंका की स्वतन्त्रता और सम्प्रभुता को चुनौती देता है, अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के प्रावधानों का उल्लंघन करता है.

इतना ही नहीं, ये प्रस्ताव निराधार तथ्यों पर आधारित है और ये श्रीलंका के नागरिकों के हितों की अनदेखी करता है.

ग़ौरतलब है कि श्रीलंका में क़रीब 26 वर्षों तक चले गृह युद्ध में हज़ारों लोगों की मौत हुई थी.

ये गृह युद्ध वर्ष 2009 के अन्त में समाप्त हुआ था जिसमें आरोप लगे थे कि श्रीलंका सरकार ने तमिल विद्रोहियों पर हमला करने के दौरान बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का उल्लंघन किया था.

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