28/03/2014

दो दिन मुक़दमा, 528 को मौत की सज़ा

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मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड के सैकड़ों समर्थकों पर असाधारण रूप से मुक़दमा चलाकर 528 को मौत की सज़ा सुनाई गई है.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने इस मुक़दमे को असाधरण और अजीब क़रार दिया है क्योंकि हाल के इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता.

मानवाधिकार कार्यालय का कहना है कि इस मुक़दमे के दौरान समुचित क़ानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और ये अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून के भी ख़िलाफ़ है.

इन 528 लोगों पर अन्य आरोपों के साथ-साथ ये गम्भीर आरोप है कि वो मुस्लिम ब्रदरहुड के सदस्य थे.

मुस्लिम ब्रदरहुड संगठन पर मिस्र में पाबन्दी लगाई हुई है.

इन लोगों पर ये भी आरोप है कि उन्होंने हिंसा को बढ़ावा दिया है, देश में तोड़फोड़ की है, ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से इकट्ठा हुए हैं और एक पुलिस अधिकारी की हत्या का भी आरोप है.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय का ये भी कहना है कि इन सैकड़ों नागरिकों पर असाधारण तेज़ी के साथ सिर्फ़ दो दिन के भीतर फ़ैसला भी सुना दिया गया जिसमें निष्पक्षता के बिल्कुल बुनियादी उसूलों का भी ध्यान नहीं रखा गया.

इस तरह से आनन-फानन में मुक़दमा चलाकर सैकड़ों लोगों को मौत की सज़ा सुना देना साफ़तौर पर अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून का उल्लंघन है.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय के प्रवक्ता रूपर्ट कॉलविल का कहना था, "इतनी बड़ी संख्या में लोगों को फाँसी की सज़ा सुना देने की मिसाल हाल के इतिहास में तो नहीं मिलती है. तमाम ख़ामियों और उल्लंघनों से भरे मुक़दमे के ज़रिए इस तरह इतनी सारे लोगों को मौत की सज़ा सुना देना अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून का स्पष्ट उल्लंघन है."

"किसी व्यक्ति को मौत की सज़ा तभी सुनाई जा सकती है जब मुक़दमे में उच्च स्तर की निष्पक्षता और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई गई हो जिसमें शक-शुबह की कोई गुंजाइश ही ना बची हो. इतने सारे लोगों पर सिर्फ़ दो दिन मुक़दमा चलाकर मौत की सज़ा सुना देने में निष्पक्षता के मामूली सिद्धान्त भी नहीं अपनाए गए हैं."

उन्होंने कहा कि इनमें से 398 यानी क़रीब तीन चौथाई मुल्ज़िमों पर तो उनकी ग़ैर-मौजूदगी में ही मुक़दमा चलाया गया, यानी उन्हें अपनी बात कहने का पूरा मौक़ा भी नहीं दिया गया."

"इन मुल्ज़िमों पर लगाए गए इल्ज़ाम भी साफ़ नहीं हैं और इन अभियुक्तों के बचाव में अदालत के सामने जो सबूत पेश किए गए उन पर भी समुचित ग़ौर नहीं किया गया."

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय का कहना है कि किसी राजनैतिक दल की सदस्यता हासिल कर लेना या प्रदर्शनों में हिस्सा लेना अत्यन्त गम्भीर अपराधों की श्रेणी में नहीं आते है जिनके लिए इस तरह मौत की सज़ा सुना दी जाए.

इस तरह की आपाधापी वाले मुक़दमे और मौत की सज़ा सुनाया जाना स्वीकार्य नहीं हो सकता.

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