21/03/2014

अल्पसंख्यक विकास एजेंडा से बाहर

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दुनिया भर में अल्पसंख्यक यानी दूसरे या तीसरे नम्बर की आबादी वाले लोग राष्ट्रीय और वैश्विक विकास एजेंडा के फ़ायदों से वंचित रह जाते हैं और पीछे छूट रहे हैं. इतना ही नहीं, उनके ख़िलाफ़ भेदभाव किया जाता है और उन्हें हिंसा का भी शिकार बनाया जाता है.

संयुक्त राष्ट्र की एक मानवाधिकार विशेषज्ञ ने ये बात कही है. रीटा इसाक अल्पसंख्यक मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र की एक स्वतंत्र विशेषज्ञ हैं.

उन्होंने कहा है कि अक्सर अल्पसंख्यक गुट ही बहुत ग़रीबी के शिकार हो जाते हैं और उनके अन्दर इतनी ताक़त नहीं बचती की वो अपनी मजबूरी की बेड़ियों को तोड़ सकें. उन्हें इन ख़राब हालात से तभी निकाला जा सकता है जब उन पर ख़ास ध्यान दिया जाए.

रीटा इसाक ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को सम्बोधित करते हुए कहा कि अल्पसंख्यकों पर चूँकि अधिकारियों और सक्षम संस्थाओं का ध्यान नहीं रहता इसलिए उनकी हालत में सुधार नहीं होता है.

उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ये एक बहुत बड़ी और गम्भीर चुनौती है क्योंकि अगर दुनिया भर का एक बड़ा तबका विकास और प्रगति से महरूम यानी वंचित रह जाता है तो विकास लक्ष्यों को हासिल करने का फ़ायदा ही क्या होगा..

रीटा इसाक ने कहा कि मध्य अफ्रीकी गणराज्य, दक्षिणी सूडान, सीरिया और म्यामाँर जैसे क्षेत्रों में हो रही लड़ाइयों की वजह से हिंसा का सबसे ज़्यादा असर अल्पसंख्यक यानी कम संख्या वाले जातीय गुटों पर पड़ता है.

उन्होंने तमाम देशों और विकास एजेंडा तय करने वाली संस्थाओं का आहवान किया कि वो अगर 2015 के बाद वाले विकास लक्ष्यों को सचमुच हासिल करना चाहते हैं तो बहुत कुछ करना होगा. इसके लिए ज़रूरी है कि जो लोग बहुत ही ख़राब हालात में रहने को मजबूर हैं, उनकी स्थिति में सुधार लाने के ठोस प्रयास करने होंगे.

रीटा इसाक का कहना था, “लगभग हर देश में ऐसा देखा गया है कि किसी आबादी का छोटा हिस्सा ख़राब स्वास्थ्य की समस्या का सामना करता है और इतना ही नहीं, स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ भी कम आबादी वाले तबक़े यानी अल्पसंख्यकों को नहीं मिल पाता है. जबकि बड़ी आबादी वाला तबक़ इन सुविधाओं का लाभ भरपूर तरीक़े से उठाता है यानी अल्पसंख्यकों को उनके अधिकारों से वंचित रखा जाता है.”

“अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों में देखा गया है कि उनकी मौतें कम उम्र में ही हो जाती हैं, वे ज़्यादा बीमारियों के भी शिकार होते हैं और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने के लिए उन्हें ज़्यादा जद्दोजहद करनी पड़ती है. यहाँ तक कि किसी भी तरह की लड़ाई का असर अल्पसंख्यकों पर सबसे ज़्यादा होता है, भरे ही वो अल्पसंख्यक उन लड़ाइयों का हिस्सा हों या ना हों. अल्पसंख्यकों को प्रताड़ना का सामना करना पडता है और अक्सर उन्हें अपने घर छोड़ने पड़ते हैं, कभी-कभी तो बड़ी संख्या में लोगों को विस्थापित होना पड़ता है.”

रीटा इसाक ने कहा,  ”नए विकास लक्ष्यों में ये ध्यान रखना होगा कि इस तरह के हालात का सामना करने वाले अल्पसंख्यक लोगों को अन्यायपूर्ण व्यवस्था के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता. देखा गया है कि अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ संस्थागत भेदभाव होता है और यहाँ तक कि जिन स्थानों पर अल्पसंख्यक लोग रहते हैं वहाँ बुनियादी सुविधाओं और सेवाओं में धन भी नहीं लगाया जाता है.”

उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों का सामाजिक बहिष्कार रोकने और उनके आर्थिक और सामाजिक विकास सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी है कि उन्हें ज़्यादा अवसर मुहैया कराए जाएँ. इनमें विशेष सामाजिक और आर्थिक योजनाओं के साथ-साथ उन क्षेत्रों में भी तेज़ी से विकास किया जाना ज़रूरी है जिन स्थानों पर अल्पसंख्यक रहते हैं.

उन्होंने विश्व भर में लोगों के बीच मौजूद असमानता की खाई को भरने के लिए ठोस उपाय और प्रयास करने का आहवान किया.

रीटा इसाक ने कहा कि असामनता की वजह से ही अल्पसंख्यकों को समाज और विकास के हाशिये पर ढकेल दिया जाता है.

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