14/03/2014

बच्चों को क़ानून व न्याय का सहारा

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दुनिया भर में बहुत से बच्चे ऐसे होते हैं जो ख़ुद पर किए गए अत्याचारों और ज़्यादतियों के मामलों में अदालतों का दरवाज़ा इसलिए नहीं खटखटा पाते क्योंकि उन्हें बदले में ज़्यादा प्रताड़ना और मुश्किलों का सामना करने का डर होता है.

इन परेशानियों में अक्सर ऐसे बच्चों के परिवारों को भी लपेट लिया जाता है.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने एक ताज़ा रिपोर्ट में ये बात कही है.

जो बच्चे अनाथालयों या अन्य संस्थाओं की देखरेख में रहते हैं वहाँ से न्यायिक व्यवस्था का सहारा लेना अक्सर ज़्यादा मुश्किल होता है.

इनके अलावा जो बच्चे बहुत ही ज़्यादा ग़रीबी में रहते हैं या जो बच्चे लड़ाई या संघर्ष में फँस जाते हैं उन्हें भी न्यायिक मदद नहीं मिल पाती है और ये बच्चे अक्सर उन लोगों की ज़्यादतियों का शिकार होते हैं जिनकी देखरेख में वो रहने को मजबूर होते हैं.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उप उच्चायुक्त फ्लेविया पन्सीरी ने कहा कि तमाम देशों की सरकारों को ऐसी क़ानूनी व्यवस्था विकसित करनी होगी जिसमें बच्चे अपनी बात बिना किसी डर के कह सकें और जिससे बच्चों के अधिकार मज़बूत हों और वे अपने अधिकारों का फ़ायदा उठा सकें.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की वार्षिक बैठक में बाल अधिकारों के मुद्दे पर फ्लेविया पन्सीरी ने कहा कि तमाम देशों की राष्ट्रीय क़ानून प्रणालियों में ये क्षमता होनी चाहिए कि वो बच्चों की शिकायतें सुनने के साथ-साथ उन्हें बिना देरी और समस्या के दूर भी कर सकें.

फ्लेविया पन्सीरी का कहना था, “बच्चों के लिए आसानियाँ पैदा करने वाली क़ानूनी और न्यायिक प्रणालियों में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें बच्चों की शिकायतें बिना किसी रुकावट या नकारात्मक प्रभाव के और सुरक्षित और असरदार तरीक़े से सुनी जा सकें.

“इस व्यवस्था तक बच्चों की आसान पहुँच होनी चाहिए. बच्चों को सशक्त बनाने के लिए ज़रूरी है कि उनसे सम्बन्धित फ़ैसलों में बच्चों की बात भी सुनी जाए और उनके विचारों को फ़ैसलों और नीतियों में शामिल किया जाए.”

 उन्होंने कहा, “बच्चों को अपने अधिकारों के बारे में पूरी जानकारी और सूचना मुहैया होनी चाहिए. अगर बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन होता है तो उन्हें किसी भी ज़्यादती के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में सक्षम बनाया जाए.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उप उच्चायुक्त फ्लेविया पन्सीरी ने कहा,  ”बच्चों को किसी भी तरह की चालबाज़ी, प्रताड़ना, बदले की कार्रवाई और डराने-धमकाने के माहौल से सुरक्षित रखा जाए. बच्चों से सम्बन्ध रखने वाले तमाम पेशेवर लोगों को बच्चों के अधिकारों और उनकी ज़रूरतों की पूरी जानकारी होनी चाहिए और उन्हें समुचित रूप से प्रशिक्षित किया जाए.”

उन्होंने ये भी कहा कि बच्चों की भावनाओं और ज़रूरतों का ध्यान रखने वाली न्यायिक व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए है जिसमें बाल अधिकारों का सम्मान किया जाए और उनकी नाज़ुक स्थिति को समझा जाए.