7/03/2014

मौत की सज़ा ख़त्म करने की पुकार

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संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त नवी पिल्लई ने मौत की सज़ा का प्रावधान रखने वाले देशों से फिर आहवान किया है कि वो इस दंड को ख़त्म करने के लिए तेज़ी से उपाय करें.

नवी पिल्लई ने बुधवार को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को सम्बोधित करते हुए ये गुहार लगाई.

मानवाधिकार उच्चायुक्त ने कहा कि 1948 में मानवाधिकारों के सार्वभौमिक घोषणापत्र को लागू किए जाने के बाद से मृत्यु दंड को समाप्त करने की दिशा में तेज़ी से प्रगति देखी गई है लेकिन फिर भी कुछ देश ऐसे बचे हैं जहाँ मृत्यु दंड को अभी समाप्त नहीं किया गया है.

नवी पिल्लई ने कहा कि दुनिया भर के 160 देशों ने अपने यहाँ मृत्य दंड को या तो समाप्त कर दिया है, या इस पर अघोषित रूप से रोक लगा दी है.

इनमें से कुछ देश ऐसे भी हैं जिन्होंने मृत्यु दंड को समाप्त करने के लिए औपचारिक या क़ानूनी प्रावधान तो नहीं किए हैं लेकिन मृत्य दंड की सज़ा पर अमल नहीं किया जाता है.

उन्होंने कहा कि ऐसे कोई पुख़्ता सबूत नहीं हैं कि मृत्यु दंड देने से अन्य सज़ाओं वाले अपराधों को कम करने में कोई ठोस मदद मिलती है यानी मृत्यु दंड से घबराकर लोग अपराध करने से बचते हैं.

सिर्फ़ सज़ा की गम्भीरता की वजह से अपराधियों को अपराध करने से रोका जा सके, इसके कोई ठोस सबूत नहीं हैं बल्कि इसके बजाय अगर सज़ा मिलने की पक्की व्यवस्था हो तो उससे अपराधियों को अपराध करने से रोका जा सकता है.

इसलिए अगर अपराधों को रोकना है तो न्यायिक व्यवस्था को कारगर बनाना होगा और न्यायिक फ़ैसले जल्दी सुनाकर उन पर तेज़ी से अमल करने की व्यवस्था करनी होगी.

साथ ही न्यायिक व्यवस्था को ज़्यादा मानवीय भी बनाना होगा.

मानवाधिकार उच्चायुक्त नवी पिल्लई ने कहा कि मृत्यु दंड बुनियादी मानवाधिकारों से मेल नहीं खाता है क्योंकि मौत की सज़ा एक तरह से इंसान को जीने के अधिकार से वंचित करती है जोकि उसका बुनियादी मानवाधिकार है.

उस पर भी चिन्ता की बात है कि मौत की सज़ा का शिकार होने वाले ज़्यादातर ग़रीब, अल्पसंख्यक या ऐसे अन्य समूह होते हैं जिनके साथ भेदभाव किया जाता है.

नवी पिल्लई ने ये भी कहा कि मृत्यु दंड के साथ एक अन्य समस्या ये भी है कि जब इस पर अमल किया जाता है तो अक्सर ऐसे लोगों को जीवन से वंचित कर दिया जाता है जिन्होंने वो अपराध ही किया ही नहीं होता.

लेकिन अगर वो व्यक्ति निर्दोष होता है तो उस व्यक्ति को फिर से जीवित तो नहीं किया जा सकता.