7/02/2014

कैंसर में इलाज से ज़्यादा एहतियात

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दुनिया भर में कैंसर के मामले चिन्ताजनक रफ़्तार से बढ़ रहे हैं और विशेषज्ञों ने चेतावनी देते हुए कहा है कि इस बीमारी को रोकने के लिए तुरन्त ठोस उपाय किए जाने चाहिए और उन पर तेज़ी से अमल भी होना चाहिए.

अन्तरराष्ट्रीय कैंसर शोध एजेंसी IARC ने विश्व भर में कैंसर की स्थिति पर ताज़ा रिपोर्ट पेश की है.

इसमें दिखाया गया है कि वर्ष 2012 में कैंसर की बीमारी होने के नए मामलों की संख्या बढ़कर लगभग एक करोड़ चालीस लाख हो गई.

इतना ही नहीं अगले दो वर्षों के दौरान इसमें लगातार बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है हर वर्ष कैंसर होने के नए मामलों की संख्या बढ़कर दो करोड़ 20 लाख होने की सम्भावना है.

सबसे ज़्यादा फेफड़ों का कैंसर होने के मामले देखे गए हैं जिनकी संख्या एक करोड़ 80 लाख के आसपास है.

उसके बाद दूसरे नम्बर पर छाती का कैंसर होने के मामले हैं जिनकी संख्या लगभग एक करोड़ 70 लाख है. पेट के कैंसर के मामले तीसरे नम्बर पर हैं जिनकी संख्या लगभग एक करोड़ 40 लाख बताई गई है.

रिपोर्ट कहती है कि कैंसर की बीमारी होने के नए मामले ज़्यादातर विकासशील देशों में ही दर्ज किए जा रहे हैं.

इनमें से भी 60 फ़ीसदी से भी ज़्यादा मामले अफ्रीका, एशिया और मध्य और दक्षिणी अमरीका में होते हैं.

रिपोर्ट तैयार करने वाले सम्पादकों में से एक डॉक्टर बर्नार्ड स्टीवार्ट का कहना है कि कैंसर के ख़िलाफ़ संघर्ष में सिर्फ़ इलाज करना ज़्यादा कारगर उपाय नहीं बचा है बल्कि इससे बचने के लिए अहतियाती उपाय भी निर्णायक साबित हो सकते हैं.

डॉक्टर बर्नार्ड स्टीवार्ट का कहना है, "कैंसर को होने से रोकने के लिए दो स्तरों पर अहतियाती उपाय किए जा सकते हैं. इनमें पहला ये है कि लोगों को ऐसी वस्तुओं के इस्तेमाल से रोका जाए जिनके बारे में ये साबित हो चुका है कि उनके सेवन से कैंसर होने का ख़तरा बहुत होता है. इनमें तम्बाकू और शराब जैसी नशीली वस्तुओं का सेवन करने वालों को कैंसर का ख़तरा बहुत होता है.”

“इन मामलों में काफ़ी हद तक व्यक्ति का ख़ुद का बर्ताव कैंसर होने के लिए ज़िम्मेदार होता है. इनके अलावा ऐसे कारणों से भी कैंसर होता है जिनमें व्यक्ति का निजी तौर पर हालात पर कोई ख़ास नियंत्रण नहीं होता जैसे कि कामकाज से स्थानों पर प्रदूषण या ऐसे कारण मौजूद होना जिनसे कैंसर होने का ख़तरा होता हो. ऐसे में ये ज़रूरी है कि ख़तरनाक निजी आदतों, पर्यावरण प्रदूषण और कामकाज से स्थानों पर कैंसर होने के कारणों को कम या ख़त्म करने के लिए क़ानूनों का सहारा लिया जा सकता है.”

डॉक्टर बर्नार्ड स्टीवार्ट ने कहा कि ये निजी पसन्द या नापसन्द होने का मामला नहीं बल्कि लोगों को सही पसन्द अपनाने के लिए अच्छे हालात पैदा करने का मामला है. ज़रूरी ये भी है कि इस तरह की चीज़ों के दाम बढ़ा दिए जाएँ, साथ ही इनकी उपलब्धता कम कर दी जाए और इनके विज्ञापन पर रोक लगा दी जाए ताकि लोग इनकी तरफ़ आकर्षित ही ना हों. हमें ध्यान रखना होगा कि इन उत्पादों ने दुनिया भर में कैंसर का बोझ बहुत बढ़ा दिया है."

उन्होंने ये भी कहा कि तमाम सरकारों को कैंसर रोकने के कार्यक्रमों और क़ानूनों पर निगरानी करने और शुरूआती स्तर पर ही जाँच पड़ताल सुनिश्चित करने के लिए मुस्तैदी दिखानी होगी ताकि कैंसर की बीमारी को होने से रोकने में ठोस मदद मिल सके.

उन्होंने कहा कि अहतियाती उपायों पर रक़म ख़र्च करना एक निवेश की तरह है जिससे इलाज पर रक़म ख़र्च करने से बचा जा सकेगा.