10/01/2014

नेपाल में आम माफ़ी पर रोक का स्वागत

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संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त नवी पिल्लई ने नेपाल के सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले का स्वागत किया है जिसमें उसने देश में दस वर्ष तक चले हिंसक संघर्ष के दौरान हुए मानवाधिकार उल्लंघन के गम्भीर मामलों में आम माफ़ी दिए जाने रोक लगाई है.

मानवाधिकार उच्यायुक्त नवी पिल्लई ने कहा है कि नेपाली सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से उन हज़ारों लोगों को राहत मिलेगी जो हिंसक संघर्ष के दौरान मानवाधिकार उल्लंघन मामलों के शिकार हुए हैं.

नेपाल सरकार ने उस हिंसक संघर्ष के दौरान गम्भीर मानवाधिकार उल्लंघन के लिए ज़िम्मेदार लोगों को आम माफ़ी देने के लिए वर्ष 2013 में एक अध्यादेश जारी किया था.

अनेक मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सरकार के उस अध्यादेश को नेपाल के सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी जिस पर ये फ़ैसला आया है.

नेपाल में उस अध्यादेश के ज़रिए एक सत्य और सुलह-सफ़ाई आयोग गठित किया गया था जिसे 1996 से 2006 के दशक में हुए मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों की जाँच करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी.

उस संघर्ष के दौरान क़रीब 13 हज़ार लोगों की मौत हुई थी और लगभग 1300 अब भी लापता हैं.

नेपाली सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि सरकारी अध्यादेश से उन बुनियादी मानवाधिकारों की गारंटी कम होती है जो नेपाली संविधान नागरिकों को देता है. साथ ही अध्यादेश के प्रावधानों से न्यायिक व्यवस्था और अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का भी उल्लंघन होता है.

उच्चायुक्त नवी पिल्लई ने कहा कि ये सुनिश्चित करने की दिशा में ये पहला क़दम है कि हिंसक संघर्ष से सम्बन्धित मामलों की जाँच में देरी करने के लिए आयोग के प्रावधानों का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा.