13/12/2013

मलाला सहित छह को मिला 2013 का मानवाधिकार पुरस्कार

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मानवाधिकार क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र के इस वर्ष के पुरस्कार वितरित कर दिए गए हैं.

ये प्रतिष्ठित पुरस्कार पाने वालों में शिक्षा प्रसार के लिए अभियान चलाने वाली पाकिस्तानी किशोरी मलाला यूसुफ़ज़ई का नाम भी शामिल है.

मलाला के अलावा अन्य हस्तियाँ व संस्थान हैं – बिरम दाह अबीद, हिलज्मनीजेता अपूक, लीज़ा कॉपीनेन, खदीजा रयादी और मैक्सिको का सुप्रीमकोर्ट.

संयुक्त राष्ट्र का ये पुरस्कार ऐसी हस्तियों और संस्थाओं को दिया जाता है जिन्होंने मानवाधिकार क्षेत्र में असाधारण कार्य किया हो.

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ये पुरस्कार 1966 में शुरू किया था और पहली बार 10 दिसम्बर 1968 को ये पुरस्कार प्रदान किया गया.

ये अवसर था मानवाधिकारों का सार्वभौम घोषणा-पत्र लागू होने के दो दशक पूरे होने का. तभी से दस दिसम्बर को अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के रूप में मनाया जाता है.

1968 के बाद से आमतौर पर हर पाँच वर्ष में ये पुरस्कार दिया जाता है. इस तरह 1968, 1973, 1978, 1988, 1993, 1998, 2003, 2008 और 2013 यानी इस वर्ष ये पुरस्कार प्रदान किया गया है.

अभी तक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार पुरस्कार पाने वालों में एमनेस्टी इंटरनेशनल, जिमी कार्टर, मार्टिन लूथर किंग, नेलसन मंडेला और इलीनॉर रूज़वेल्ट जैसे नाम शामिल हैं.

इस पुरस्कार के ज़रिए उन लोगों के कार्यों को पहचान और सम्मान दिया जाता है जिन्होंने मानवाधिकार क्षेत्र में असाधारण कार्य किया है.

साथ ही पूरी दुनिया को ये सन्देश भी भेजा जाता है कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय उन लोगों और संस्थाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है जो मानवाधिकारों की रक्षा के लिए दिन रात एक करते हैं.

इस पुरस्कार के लिए विभिन्न देशों, संस्थाओं, व्यक्तियों और विशेषज्ञ एजेंसियों की तरफ़ से क़रीब 150 प्रविष्टियाँ दाख़िल हुई थीं.

पुरस्कार वितरण समारोह दस दिसम्बर को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित किया गया.

इसी वर्ष संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय के वजूद में आने, विएना घोषणा पत्र लागू होने की बीसवीं वर्षगाँठ भी मनाई गई है.

बहुत से बच्चे अब भी शिक्षा से वंचित है्ंवर्ष 2013 के मानवाधिकार पुरस्कार विजेताओं का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है –

मलाला यूसुफ़ज़ई – पाकिस्तान की किशोरी मलाला यूसुफ़ज़ई युवा महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई की दुनिया भर में प्रतीक बन गई हैं. शुरू में मलाला महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों की हिमायत करने वाली कार्यकर्ता के तौर पर जानी गईं लेकिन कुछ ही समय बाद मलाला महिला सशक्तिकरण और लड़कियों के शिक्षा अधिकारों के लिए ज़ोरदार आवाज़ उठाने वाली अन्तरराष्ट्रीय हस्ती बन गईं. अक्तूबर 2012 में मलाला यूसुफ़ज़ई पर पाकिस्तान में ही उस समय जानलेवा हमला किया गया जब वो अपने स्कूल से घर लौट रही थीं. मलाला पर ये हमला लड़कियों की शिक्षा की हिमायत करने के विरोध में किया गया था. तब से मलाला यूसुफ़ज़ई ने लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों के लिए दुनिया भर में आवाज़ उठाई है.

बिरम दाह अबीद इन्होंने मॉरीतानिया में दास प्रथा के ख़िलाफ़ व्यापक अभियान चलाया है जिसके ठोस नतीजे सामने आए हैं. अबीद ख़ुद भी एक आज़ाद किए गए दास के पुत्र हैं. वर्ष 2008 में उन्होंने दास प्रथा को मिटाने के लिए एक ग़ैर सरकारी संगठन (एनजीओ) भी बनाया था जिसका नाम है – the Initiative for the Resurgence of the Abolitionist Movement. ये संगठन दास प्रथा के मुद्दे की तरफ़ लोगों का ध्यान खींचता है और दास प्रथा के मुद्दों को अदालतों तक पहुँचाने में भी मदद करता है.

हिलज्मनीजेता अपूक – कोसोवो में ऐसे लोगों के मानवाधिकारों के लिए अभियान चलाती हैं जिनका क़द छोटा रह जाता है. अपूक विकलांग लोगों के अधिकारों के लिए कोसोवो में और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पिछले क़रीब 30 वर्षों से अभियान चलाती रही हैं. अपूक Little People of Kosovo नामक ग़ैर सरकारी संगठन की संस्थापक हैं और विकलांग लोगों के लिए रोज़गार अवसर बढ़ाने लिए भी अभियान चला रही हैं.

लीज़ा कॉपीनेन - फिनलैंड निवासी हैं और विश्व बधिर महासंघ की मानद अध्यक्ष हैं. लीज़ा बधिर यानी बहरे लोगों के मानवाधिकारों के लिए 1970 से अभियान चला रही हैं. लीज़ा के प्रयासों की बदौलत ही बधिर लोगों के लिए संकेत भाषाओं, बधिर व्यवहार, बधिर समुदाय और ऐसे लोगों की ख़ास पहचान सम्बन्धित सन्दर्भों को वर्ष 2006 में विकलांग लोगों के अधिकारों सम्बन्धित संयुक्त राष्ट्र सन्धि में शामिल किया गया था. अलबत्ता लीज़ा का मानवाधिकार कार्य सिर्फ़ बधिर लोगों तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि उन्होंने महिलाओं के अधिकारों और विकलांग महिलाओं के अधिकारों के लिए भी असाधारण कार्य किया है. लीज़ा ने अफ्रीका, मध्य एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, लातीनी अमेरिका, बाल्कन और पश्चिमोत्तर रूस के देशों में अनेक परियोजनाओं में सहयोग किया है.

ख़दीजा रयादी – मोरक्को की मानवाधिकार परिषद की पूर्व अध्यक्ष हैं. ख़दीजा 1983 में मानवाधिकार परिषद में शामिल हुई थीं और तभी से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं. ख़दीजा ख़ासतौर से पुरुष और महिलाओं के बीच समानता और अधिकारों की बराबरी के लिए संघर्षरत रही हैं. ख़दीजा मोरक्को में मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले 22 ग़ैर-सरकारी संगठनों के नेटवर्क की संयोजक भी हैं.

मैक्सिको का सुप्रीम कोर्ट- इसे मैक्सिको का संवैधानिक न्यायालय भी कहा जाता है जो मैक्सिको के नागरिकों और निवासियों के संवैधानिक अधिकारों को संरक्षण प्रदान करता है. मैक्सिको के राष्ट्रीय सुप्रीम कोर्ट ने संविधान को लागू करने के लिए की गई टिप्पणियों और व्याख्या की बदौलत मानवाधिकारों को लागू करने में ख़ासी प्रगति दर्ज की है.

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