22/11/2013

विश्व बाल दिवस पर बाल शोषण और हिंसा रोकने पर ज़ोर

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बुधवार 20 नवम्बर को विश्व बाल दिवस के अवसर पर यूनीसेफ़ ने कहा कि ऐसे करोड़ों बच्चों की हालत पर ख़ास ध्यान देने की ज़रूरत है जो हर देश में और समाज के हर वर्ग में दुर्व्यवहार और हिंसा का शिकार होते हैं.

यूनीसेफ़ ने कहा कि ज़्यादा चिन्ता की बात ये है कि इस क्रूर बर्ताव का शिकार होने वाले बच्चों के मामले कोई ख़बर नहीं बनते और ये बच्चे लगातार इस क्रूरता का शिकार होते रहते हैं.

विश्व बाल दिवस बच्चों के अधिकारों से सम्बन्धित संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन की वर्षगाँठ के अवसर पर मनाया गया.

यूनीसेफ़ के कार्यकारी निदेशक एंथॉनी लेक का कहना था कि अक्सर बच्चों पर हिंसा गुपचुप तरीक़े से होती है और उसे पुलिस वग़ैरा को रिपोर्ट नहीं किया जाता.

उससे भी ज़्यादा ख़तरनाक बात ये है कि इस हिंसा को नीयति मानकर स्वीकार कर लिया जाता है.

उन्होंने कहा कि हम सभी की ये ज़िम्मेदारी बनती है कि इस तरह की हिंसा और दुर्व्यवहार के शिकार होने वाले बच्चों के मामलों को सामने लाएँ.

इसके लिए हमें सख़्त क़ानून बनाने के लिए सरकारों को मजबूर करना होगा ताकि बच्चों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा को रोका जा सके.

इसके अलावा तमाम नागरिकों में ये हिम्मत और हौसला जगाना होगा कि अगर उनके सामने बच्चों पर किसी तरह की हिंसा होती है तो वे ख़ामोश ना रहें, बल्कि इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँ.

ध्यान देने की बात है कि बच्चों के ख़िलाफ़ हिंसा कई तरीक़े से होती है. इसमें घरों में होने वाली हिंसा, यौन दुर्व्यवहार के साथ-साथ बच्चों को अनुशासित करने के लिए अपनाए जाने वाले सख़्त तरीक़े भी शामिल होते हैं.

ऐसे मामले अक्सर युद्धग्रस्त क्षेत्रों में ज़्यादा होते हैं. इस तरह की हिंसा बच्चों को शारीरिक नुक़सान पहुँचाने के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व को मानसिक और मनोवैज्ञानिक तौर पर भी तोड़ देती है.

यूनीसेफ़ के प्रमुख एंथॉनी लेक का ये भी कहना था कि बच्चों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा से सिर्फ़ उन बच्चों को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को नुक़सान होता है क्योंकि इससे उत्पादकता के साथ-साथ बच्चों के व्यापक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है और अन्ततः इससे किसी भी समाज का ताना-बाना बिखर जाता है.

उनका कहना था कि कोई भी समाज बच्चों पर होने वाली हिंसा को नज़रअन्दाज़ नहीं कर सकता.

एंथॉनी लेक ने कहा कि बच्चों पर हिंसा को रोकने के लिए ज़रूरी है कि माता-पिता, अभिभावकों और ऐसे तमाम लोगों और संस्थाओं को जागरूक बनाया जाए जो बच्चों के सम्पर्क में रहते हैं.

साथ ही बच्चों में ऐसा हुनर और क्षमताएँ विकसित की जाएँ जिनके बल पर वो हिंसा और दुर्व्यवहार की स्थित में अपनी हिफ़ाज़त कर सकें.

इसके अलावा समाज में हिंसा और दुर्व्यवहार को सहन करने की मनोवृत्ति को भी बदलना होगा. ऐसे क़ानून और नीतियाँ भी बनानी और लागू करनी होंगी जो बच्चों की सुरक्षा को सुनिश्चित करें.