22/11/2013

जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए धन की ज़रूरत

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संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर चल रही बातचीत की प्रगति में भरोसा बढ़ाने के लिए और ज़्यादा धन की ज़रूरत है तभी कोई ठीक रास्ता निकल सकेगा.

बान की मून ने ये बात पोलैंड की राजधानी वारसा में मंत्रि स्तरीय बैठक में कही. इस बैठक में जलवायु वित्त के मुद्दे पर विचार किया गया.

महासचिव बान की मून ने आगाह करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन फिलहाल विश्व शान्ति, ख़ुशहाली और टिकाऊ विकास के लिए सबसे बड़ा अकेला ख़तरा है इसलिए ये बेहद ज़रूरी है कि इस चुनौती का सामना करने के लिए कोई ठोस कार्रवाई बिना देर के होनी चाहिए.

बान की मून का कहना था, “किस चीज़ की ज़रूरत है, ये हमें बिल्कुल स्पष्ट होना चाहिए. पहला तो ये कि हमें टिकाऊ निवेश की नीतियाँ बनानी होंगी और रचनात्मक ढाँचा भी चाहिए. दूसरे, सार्वजनिक क्षेत्र में ख़र्च करने के लिए और ज़्यादा धन की ज़रूरत है.”

“तीसरे, निजी क्षेत्र से भी और ज़्यादा धन उगाहना होगा. और चौथी बात ये की तमाम निवेश और धन को इस तरह से उपलब्ध कराना होगा कि उसकी जहाँ ज़रूरत है, वो वहाँ पहुँच सके.”

उन्होंने कहा कि फिलहाल तो इसकी ही ज़रूरत है. जलवायु परिवर्तन तमाम तरह की अर्थव्यवस्थाओं के लिए बड़ा ख़तरा है, चाहें वो छोटी हों या बड़ी. और कुल मिलाकर ये वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की स्थिरता के लिए ही ख़तरा है.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने चेतावनी के अन्दाज़ में ये भी कहा कि इस चुनौती से निपटने में जितनी देर की जाएगी, उतनी ही लागत बढ़ती जाएगी.

और इसका असर तमाम समुदायों, व्यापारिक व औद्योगिक घरानों, अर्थव्यवस्थाओं और व्यापक तौर पर पूरी पृथ्वी पर पड़ेगा.

उन्होंने ये भी याद दिलाया कि जलवायु परिवर्तन सन्धि से सम्बद्ध पक्षों ने दो वर्ष के अन्दर वैश्विक जलवायु समझौता पूरा करने पर सहमति जताई है.