8/11/2013

संसाधन प्रबन्धन में महिला ताक़त बढ़ाएँ

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संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि महिलाओं को अगर ज़मीन, जल, जंगल और खनिज पदार्थों जैसे प्राकतिक संसाधनों के प्रबन्धन का नियंत्रण दे दिया जाए तो युद्ध का सामना कर रहे देशों में टिकाऊ शान्ति क़ायम करने की सम्भावना बढ़ सकती है.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम – UNEP की एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन देशों में लड़ाई या हिंसा होती है, वहाँ अक्सर महिलाओं को ही खाना-पानी और ऊर्जा की क़िल्लत का सामना करना पड़ता है क्योंकि इन चीज़ों की ज़रूरत घर चलाने में पड़ती है.

मिसाल के तौर पर सियरा लियोन में बहुत सी महिलाएँ पेड़-पौधे लगाने और उन्हें पालने तथा आभूषणों में काम आने वाली चीज़ों के खनन में सक्रिय हैं.

ऐसा अनुमान है कि कुछ इलाक़ों में तो छोटे पैमाने पर होने वाले स्वर्ण खनन में 90 प्रतिशत महिलाएँ ही सक्रिय हैं.

इस तरह महिलाएँ प्राकृतिक संसाधनों के प्रबन्धन और इस्तेमाल में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं.

इसके बावजूद महिलाओं को अक्सर ज़मीन का मिलाकाना हक़ नहीं मिलता है. उन्हें संसाधनों और धन-दौलत से होने वाले फ़ायदों से भी वंचित रखा जाता है.

इसके अलावा शान्ति स्थापना में संसाधन प्रबन्धन के बारे में निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी शामिल नहीं किया जाता है.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम – यू एन ई पी के कार्यकारी निदेशक अशिम स्टीनर का कहना था, "वास्तविकता ये है कि शान्ति स्थापना करने के प्रयासों में ज़्यादातर महिलाएँ ही संसाधनों का प्रबन्धन और इस्तेमाल करती हैं लेकिन ऐसा बहुत कम होता है कि ये ज़िम्मेदारी और भूमिका राजनीतिक और आर्थिक स्तर निर्णायक जगह ले सके. इस चलन को बदलना होगा."

अशिम स्टीनर का कहना था कि शान्ति और विकास तभी सुनिश्चित किए जा सकते हैं जब प्राकृतिक संसाधनों का लाभ महिला और पुरुष दोनों को ही समान रूप से मिले और ये समानता टिकाऊ हो.

संयुक्त राष्ट्र के महिला संगठन की कार्यकारी निदेशक फ्यूमज़ाइल म्लाम्बो नकूका का कहना था कि संघर्ष कहीं और किसी भी तरह का हो, सबसे ज़्यादा ख़ामियाज़ा महिलाओं को ही भुगतना पड़ता है.

महिलाओं को अक्सर अपने परिवारों और समुदायों की देखभाल अकेले ही करनी पड़ती है और बेशक महिलाएँ शान्ति और विकास की मज़बूत एजेंट होती हैं.