25/10/2013

लाखों टीबी मरीज़ इलाज के इन्तज़ार में गँवा देते हैं जान

सुनिए /

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साल जिन तीस लाख लोगों को टीबी हो गई थी उन्हें समुचित इलाज नहीं मिल रहा है जिसकी वजह से उन्हें इस रोग से छुटकारा नहीं मिल पा रहा है.

रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि अन्य लाखों लोग टीबी की उस क़िस्म के मरीज़ बन चुके हैं जिस पर अनेक दवाइयों का भी असर नहीं होता और इसे एमडीआर-टीबी कहा जाता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के विश्व टीबी कार्यक्रम की डॉक्टर कैरिन वेयेर का कहना था कि दो प्रमुख चुनौतियाँ दरपेश हैं जिनका सामना किया जाना बहुत ज़रूरी है…

"पहली ये कि उन तीस लाख मरीज़ों का पता लगाया जाए जिन्हें टीबी हो चुकी है लेकिन वे लापता हैं और दूसरी ये कि एमडीआर-टीबी के मरीज़ों के सही तरीक़े से परीक्षण किए जाएँ और उनके इलाज की व्यवस्था मुस्तैद की जाए."

डॉक्टर कैरिन वेयेर का कहना था कि दवाइयों और समुचित रूप से प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी की वजह से समस्या और गम्भीर हो रही है, "हमारे पास ऐसी टीबी का सामना करने के लिए पर्याप्त संख्या में डॉक्टर और नर्सें नहीं हैं जिस टीबी पर दवाइयों का असर होना बन्द हो गया है. ये बहुत जटिल समस्या है."

"मरीज़ों पर दवाइयों के बहुत ख़राब असर हो रहे हैं जिस पर क़ाबू पाया जाना बहुत ज़रूरी है. और हमारे सामने इन मरीज़ों के इलाज और देखभाल के लिए जितने स्वास्थ्यकर्मियों की ज़रूरत है, वो नहीं हैं.”

उन्होंने कहा कि इसका नतीजा ये होता है कि बहुत से मरीज़ों की तभी मौत हो जाती है जब वो अपने इलाज के लिए अपनी बारी का इन्तज़ार कर रहे होते हैं. इतना ही नहीं, उनसे अन्य लोगों में भी ये एमडीआर-टीबी फैल जाती है.

एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2012 में क़रीब साढ़े चार लाख लोगों को ये एमडीआर-टीबी हुई जिस पर दवाइयाँ काम नहीं करती हैं लेकिन सिर्फ़ 94 हज़ार का ही परीक्षण के बाद पता चल सका कि उन्हें ये बीमारी लग चुकी थी.

इनमें से भी 16 हज़ार मरीज़ों को लम्बी प्रतीक्षा सूचियाँ होने की वजह से कभी इलाज ही नहीं मिल सका.

हालाँकि दूसरी तरफ़ विश्व स्वास्थ्य संगठन की विश्व टीबी रिपोर्ट दिखाती है कि टीबी का मुक़ाबला करने की दिशा में अच्छी-ख़ासी कामयाबी मिली है.

वर्ष 2011 में टीबी के मरीज़ों की संख्या लगभग 87 लाख थी जो पिछले वर्ष यानी 2012 में कम हो कर 86 लाख रह गई.

इसी तरह से टीबी से मौत का शिकार होने वाले लोगों की संख्या में भी कमी आई है. ये वर्ष 2011 में 14 लाख थी जो पिछले साल कम हो कर 13 लाख पर आ गई.