18/10/2013

अन्दरूनी विस्थापन का सच और भ्रम

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गुरूवार 17 अक्तूबर को ग़रीबी उन्मूलन के लिए अन्तरराष्ट्रीय दिवस के अवसर पर दिल्ली में भारत के ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने यूनेस्को की ताज़ा रिपोर्ट जारी की जिसे नाम दिया गया है – Social Inclusion of Internal Migrants in India यानी भारत में विस्थापितों का सामाजिक सम्मिश्रण.

इस अवसर पर जयराम रमेश ने कहा,  "अपने देश में ही एक जगह से दूसरी जगह जाकर बसने और कामकाज करने वाले परिवारों के लिए ये विस्थापन उनकी बेहतरी का एक अच्छा अवसर होता है. ये स्थानीय अर्थव्यस्था के लिए भी अच्छा होता है और व्यापक तौर पर देखा जाए तो पूरे देश के लिए अच्छा होता है."

यूनेस्को की इस रिपोर्ट को सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और यूनीसेफ़ का भी समर्थन हासिल है.

इसमें आन्तरिक विस्थापन के अच्छे पहलुओं पर ज़्यादा ध्यान दिया गया है और इस मुद्दे पर ज़ोर दिया गया है कि विस्थापितों को स्थानीय समाजों में घुलने-मिलने का भरपूर अवसर मिलना चाहिए, उनके पंजीकरण और उनकी पहचान साबित करने का मौक़ा मिलना चाहिए, उनकी राजनीतिक और नागरिक भागीदारी को बढ़ावा मिले.

रिपोर्ट कहती है कि अन्दरूनी विस्थापितों को स्थानीय श्रम बाज़ारों में उन्हें जगह मिले और उनके विवादों के निबटारों के लिए उन्हें क़ानूनी सहायता भी मिले, इनके अलावा महिला विस्थापितों की भागीदारी बढ़े, सभी को समुचित मात्रा में भोजन उपलब्ध रहे, उन्हें रहने के लिए आवास मिले और शिक्षा हासिल करने का भी पूरा मौक़ा मिले. स्वास्थ्य और वित्तीय सुविधाएँ भी पर्याप्त मात्रा में मिलें.

ये रिपोर्ट जारी करते हुए ये भी कहा गया कि रोज़गार पाने के उद्देश्य से देश के भीतर ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने वाले लोगों के बारे में भ्रान्तियों को भी दूर करने की ज़रूरत है.

भारत में हर दस में से कम से कम तीन लोगों को देश के भीतर ही विस्थापित होना पड़ता है और वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार ऐसे लोगों की संख्या क़रीब 31 करोड़ थी जबकि ताज़ा आँकड़ों के अनुसार ये संख्या क़रीब साढ़े 32 करोड़ तक पहुँच चुकी है जोकि कुल आबादी का लगभग तीस प्रतिशत है.

विशेषज्ञों का कहना है कि अन्दरूनी विस्थापन के योगदान और अच्छे पहलुओं को अक्सर नज़रअन्दाज़ कर दिया जाता है.

आन्तरिक विस्थापन विकास और शहरों में जान फूँकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है लेकिन फिर भी ऐसे बहुत से विस्थापित हैं उन्हें भुला दिया जाता है.

भारत, श्रीलंका, भूटान और मालदीव के लिए यूनेस्को के प्रतिनिधि शीगेरू आओयागी ने इस अवसर पर कहा, "समाज के लिए आन्तरिक विस्थापितों के योगदान के बारे में जागरूकता बढ़ाने की बेहद ज़रूरत है. इससे विस्थापितों को स्थानीय समाजों में घुलने-मिलने का मौक़ा मिलेगा जिससे अन्ततः ज़्यादा सन्तुलित और समृद्ध अर्थव्यवस्था बनाने का मौक़ा मिलेगा."

भारतीय योजना आयोग के आवास और शहरी विकास मामलों पर सलाहकार राकेश रंजन का कहना था कि भारत जैसे देश में आन्तरिक विस्थापन के ढाँचे में व्यापक बदलाव किए जाने की ज़रूरत है ताकि विस्थापितों को स्थानीय समाजों में तेज़ी से घुलने-मिलने का मौक़ा मिल सके जिससे प्रगति भी तेज़ी से हो सकेगी.