18/10/2013

बेदाम काम को पहचान की माँग

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संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र विशेषज्ञों ने तमाम देशों का आहवान किया है कि भोजन तैयार करने, बच्चों की परवरिश और ऐसे तमाम कार्यों की अहमियत को समझने की सख़्त ज़रूरत है जिन्हें अक्सर महिलाएँ करती हैं लेकिन उनके इन कामों को पहचान नहीं मिलती है.

अत्यन्त ग़रीबी पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिनिधि मैगदलेना सेपूलवेदा का कहना है कि महिलाओं के इन कामों का भी आर्थिक प्रगति और सामाजिक विकास में अहम योगदान होता है लेकिन इन कार्यों को ना तो पहचान मिलती है और ना ही समर्थन मिलता है, बल्कि महिलाओं के इन कामों में अक्सर हाथ भी नहीं बँटाया जाता है.

गुरूवार को ग़रीबी उन्मूलन के लिए अन्तरराष्ट्रीय दिवस के असवर पर संयुक्त रेडियो के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि महिलाओं द्वारा परिवारों की देखभाल के लिए किए जाने वाले कार्यों में असमानता और भेदभाव एक मानवाधिकारों से जुड़ा मुद्दा है.

मैगदलेना सेपूलवेदा का कहना था, "बेदाम कार्यों में व्यस्त रहने की वजह महिलाएँ और लड़कियाँ अक्सर आर्थिक गतिविधियों में सक्रियता के साथ हिस्सा नहीं ले पाती हैं.”

“चूँकि इन गतिविधियों की वजह से उनके पास समय नहीं बचता है इसलिए वो शिक्षा के अपने अधिकार का भी प्रयोग नहीं कर पाती हैं. इससे उनके स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है क्योंकि कामकाज की भी एक सीमा होती है जिसके बाद व्यक्ति का स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है."

डॉक्टर मैगदलेना सेपूलवेदा ने कहा कि देशों को ऐसी सार्वजनिक सेवाओं में ज़्यादा धन निवेश करना चाहिए जिनसे महिलाओं को फ़ायदा पहुंच सके, इनमें स्कूल से पहले की शिक्षा देने वाले संस्थान और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र शामिल हैं.

इससे बेदाम कार्य करने वालों के जीवन पर नकारात्मक असर को कम किया जा सकेगा.