18/10/2013

बच्चों पर हिंसा में कथनी और करनी में फ़र्क़

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संयुक्त राष्ट्र के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि बच्चों पर होने वाली हिंसा को रोकने के लिए बनी बहुत सी नीतियों और क़ानूनों के बावजूद इस क्षेत्र में समुचित काम नहीं हो पाया है.

बच्चों पर हिंसा मामलों पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव की विशेष प्रतिनिधि मार्टा सान्तोस पायस का कहना है कि जिस तरह से लड़कों को सुरक्षा और संरक्षण हासिल होता है, उसी तरह से लड़कियों को भी संरक्षा हासिल होना चाहिए.

बच्चों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा पर गुरूवार को एक सर्वे जारी किया गया.

इस अवसर पर मार्टा पायस ने संयुक्त राष्ट्र रेडियो से बातचीत में कहा कि बाल विवाह एक ऐसा उदाहरण है जिससे पता चलता है कि क़ानून किस तरह लड़कों को लड़कियों से अलग समझता है.

उनका कहना था, "आपराधिक न्याय व्यवस्था में अक्सर लड़कियों को ऐसे बर्ताव के लिए दंडित किया जाता है जिस पर अनैतिक का ठप्पा लगा दिया जाता है. हालाँकि अनैतिक व्यवहार को परिभाषित करना बहुत मुश्किल है और इस पर सबकी राय अलग-अलग होती है."

"बस अनैतिकता की विवादास्पद परिभाषा के दायरे में ही लड़कियों को दोषी ठहरा दिया जाता है जिससे उन्हें उनकी निजी आज़ादी से महरूम कर दिया जाता है और उन्हें लम्बी क़ैद भोगनी पड़ती है, जबकि ऐसा क़तई नहीं होना चाहिए."

सान्तोष पायस का कहना था कि इसके अलावा बहुत सी लड़कियों को घरेलू कामकाज में उलझा दिया जाता है जहाँ उन्हें समुचित मदद नहीं मिलती और शिक्षा से भी वंचित रहना पड़ता है.

सान्तोस पायस का ये भी कहना था कि रिपोर्ट में बहुत से देशों में किए गए सकारात्मक उपायों का भी ज़िक्र किया गया है. उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में भविष्य के लिए एक रोड मैप भी प्रस्तुत किया गया है क्योंकि कोई भी देश हिंसा के ख़तरों का सामना करने वाले बच्चों को मदद देने वाले कार्यों को तब तक वैध नहीं ठहरा सकता जब तक कि क़ानून पूरी तरह से स्पष्ट ना हों.

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