8/02/2013

सीरिया से हर दिन पाँच हज़ार लोग भागने को मजबूर

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हिंसा से प्रभावित सीरियाई लोग

सीरिया में हिंसा की वजह से भारी संख्या में लोग अन्य देशों में जाने को मजबूर हैं

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी – यूएनएचसीआर का कहना है कि सीरिया में क़रीब दो वर्ष से जारी हिंसा के हालात में कहीं और पनाह लेने की चाहत रखने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और इस स्थिति ने ख़ुद अपने आप में एक संकट का रूप ले लिया है.

यूएनएचसीआर के प्रवक्ता एड्रियान एडवर्ड्स का कहना था कि सीरियाई शरणार्थियों की संख्या लगभग सात लाख 87 हज़ार तक पहुँच चुकी है. इस वर्ष जनवरी में पड़ोसी देशों में पनाह लेने के लिए जाने वाले सीरियाई लोगों की संख्या में 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है.

एजेंसी का कहना है कि हर दिन सीरिया से लगभग पाँच हज़ार लोग पड़ोसी देशों में पनाह लेने के लिए जा रहे हैं इसलिए फिलहाल तो ये भी अपने आप में एक संकट का रूप ले चुका है.

एक तरफ़ तो पड़ोसी देशों को भागने वालों की संख्या बढ़ रही तो जो लोग सीरिया में ही रुके हुए हैं, उनके लिए भी हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं.

उधर संयुक्त राष्ट्र बाल आपदा कोष यानी यूनीसेफ़ की प्रवक्ता मैरीक्सी मेरकाडो का कहना है कि सीरिया में तमाम बुनियादी सेवाएँ, पानी की आपूर्ति और साफ़-सफ़ाई की व्यवस्था तबाह होने और साफ़-सफ़ाई का पूरा इंतज़ाम नहीं होने की वजह से बच्चों को गंभीर बीमारियों का ख़तरे बढ़ रहे हैं.

यूनीसेफ़ की प्रवक्ता मैरीक्सी मेरकाडो के अनुसार साफ़-सफ़ाई रखने वाली साबुन जैसी चीज़ें बहुत कम होने और शौचालय, स्नानघर वग़ैरा समुचित संख्या में नहीं होने की वजह से गंदगी बहुत बढ़ रही है.

“कुछ शिविरों में तो सत्तर प्रतिशत लोगों के लिए सिर्फ़ एक ही शौचालय है. पानी बहुत नपा-तुला मिलता है और एक दिन में औसतन एक व्यक्ति को सिर्फ़ दस लीटर पानी मिल पाता है."

यूनीसेफ़ की प्रवक्ता मैरीक्सी मेरकाडो की चिंता. हालाँकि यूनीसेफ़ ने उम्मीद जताई है कि जून महीने के आख़िर तक लगभग साढ़े साथ लाख लोगों को पानी, साबुन, साफ़-सफ़ाई के अन्य उपकरण, शौचालय और स्नानगर मुहैया हो पाएंगे.

यहूदी बस्तियाँ- दो राष्ट्र हल के लिए बाधा

संयुक्त राष्ट्र बान की मून ने कहा है कि इसराइल के क़ब्ज़े वाले फ़लस्तीनी इलाक़ों में यथास्थिति से ना तो कोई हल निकलने वाला है और ना ही स्वीकार्य है.

फ़लस्तीनियों के अधिकारों के लिए गठित समिति के इस वर्ष के सत्र की शुरूआत करते हुए बानव की मून ने ये बात कही.

पश्चिमी तट में यहूदी बस्तियाँ

पश्चिमी तट में यहूदी बस्तियों की मौजूदगी अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत अवैध हैं

उन्होंने कहा कि इसराइल और फ़लस्तीनी – दोनों ही पक्षों को दो देशों के समाधान के लिए अपने वादे को पूरा करने विचार करना चाहिए और ये समाधान सुरक्षा परिषद के तमाम प्रस्तावों के भी अनूरूप होगा.

दोनों पक्षों को विवादित क्षेत्र, सुरक्षा, येरूशलम, शरणार्थी, फ़लस्तीनी इलाक़ों में यहूदी बस्तियाँ और पानी जैसे सभी महत्वपूर्ण मुद्दों को भी बातचीत से ही सुलझाना होगा.

महासचिव बान की मून ने कहा कि”हम एक और वर्ष को बिना किसी ठोस नतीजे के गुज़रते हुए नहीं देख सकते. हर देश को अपने सभी नागरिकों को समान नागरिक अधिकार सुनिश्चित करने और मानवाधिकारों और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का सम्मान करने के बारे में अपने संकल्पों पर खरा उतरना होगा.

“येरूशलम को बातचीत के ज़रिए प्रस्तावित दोनों देशों की राजधानी बनाया जा सकता है. जैसा कि शांति प्रस्तावों और योजनाओं में ज़ाहिर है कि शरणार्थी समस्या का भी एक न्यायसंगत, निष्पक्ष और यथार्थवादी हल निकालना होगा.”

महासचिव बान की मून ने ये भी कहा कि दो राष्ट्रों के समाधान के लिए ये ठोस प्रस्ताव हैं, इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अरब देशों के सहयोगी पक्ष फिर से अपने सामूहिक प्रयास शुरू करने के लिए तैयार हैं लेकिन जब तक इसराइल और फ़लस्तीनी दोनों ही पक्ष ख़ुद शांति प्रक्रिया के लिए गंभीरता ना दिखाएँ, ऐसे कोई भी प्रयास निरर्थक साबित होंगे.

बान की मून ने कहा कि फ़लस्तीनी इलाक़ों में यहूदी बस्तियों की संख्या बढ़ाने संबंधी इसराइली गतिविधियों से उन्हें बहुत निराशा हुई है.

उन्होंने इसराइल सरकार का आहवान किया कि वो इन यहूदी बस्तियों के विस्तार को रोकने के अंतरराष्ट्रीय आहवान पर ध्यान देते हुए अमल करे.

महासचिव ने कहा कि यहूदी बस्तियों का ये विस्तार दो देशों वाले समाधान के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है और फ़लस्तीनी इलाक़ों में यहूदी बस्तियों का विस्तार तुरंत रुकना चाहिए.

कैंसर समस्या पर विशेष ध्यान की ज़रूरत

हर वर्ष चार फ़रवरी को विश्व कैंसर दिवस मनाया जाता है ताकि इस गंभीर स्वास्थ्य समस्या की तरफ़ ध्यान आकर्षित किया जा सके.

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यू एच ओ (WHO) के आंकड़ों के अनुसार हर साल दुनिया भर में कैंसर से लगभग 75 लाख लोगों की मौत हो जाती है. इतना ही नहीं, हर वर्ष कैंसर के क़रीब एक करोड़ 30 लाख नए मामले सामने आते हैं.

संगठन का कहना है कि कैंसर सिर्फ़ विकसित देशों में ही एक गंभीर समस्या नहीं है बल्कि कम और मध्यम आय वाले देशों में भी ये के गंभीर स्वास्थ्य चुनौती है.

इस बीच अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी आई ए ई ए (IAEA) के अध्यक्ष डॉक्टर यूकिया अमानो ने आगाह किया है कि विकासशील देशों में कैंसर का इलाज करने वाली सुविधिओं में भारी कमी की वजह से इस बीमारी ने एक गंभीर मानवीय त्रासदी का रूप ले लिया है.

डॉक्टर यूकिया अमानो का कहना था कि विकासशील देशों में लाखों-करोड़ों लोगों को कैंसर के इलाज के लिए ज़रूरी सुविधाएँ मुहैया नहीं हैं जिसकी वजह से स्थिति बेहद गंभीर है.

विश्व कैंसर दिवस के अवसर पर अपने संदेश में डॉक्टर यूकिया अमानो ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी कैंसर का मुक़ाबला करने के लिए अन्य एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रही है जिनमें रेडियो थैरेपी का इस्तेमाल भी शामिल है.

डॉक्टर यूकिया अमानो कहते हैं, “कैंसर के बारे में अक्सर एक भ्रम नज़र आता है कि ये बीमारी धनी देशों में पाई जाती है जबकि सच्चाई ये है कि कैंसर से होने वाली लगभग 70 प्रतिशत मौतें विकासशील देशों में होती हैं. आई ए ई ए के महानिदेशक के तौर पर मैंने अनेक देशों की यात्रा की है. इन यात्राओं के दौरान मैं कैंसर का इलाज करने वाले अस्पतालों का भी दौरा करने की कोशिश करता हूँ.”

उनका कहना है कि अनेक देशों में मैं देखता हूँ कि कैंसर के इलाज के लिए कोई उपकरण ही मौजूद नहीं हैं या सिर्फ़ इक्का-दुक्का उपकरण होता है. अक्सर हज़ारों लोग अपने इलाज के लिए सिर्फ़ एक मशीन पर निर्भर करते हैं."

डॉक्टर अमानो के शब्द. उन्होंने ये भी कहा कि कैंसर का शुरुआती स्तर पर पता लगाने और असरदार तरीक़े से इलाज करने की कोशिश की जाए तो लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती है और कैंसर का पता लगने के बाद भी ऐसे मरीज़ दसियों साल जी पाते हैं.

भारत में मल प्रथा उन्मूलन के प्रयासों का स्वागत

भारत में मानव मल साफ़ करती एक महिला

भारत में हाथों से मानव मल साफ़ करने की प्रथा सदियों से जारी है

भारत में शौचालयों से मल साफ़ करने की प्रथा सदियों पुरानी है जिसे आमतौर पर दलित महिलाएँ करती हैं. ये काम करने वालों को अछूत समझा जाता है.

ये लोग शौचालयों से मल साफ़ करके टोकरियों में भरकर और सिर पर ढोकर गाँव या शहर के बाहर फेंकते हैं जिसके बदले इन्हें कुछ पैसे या अनाज वग़ैरा मिलता है.

इस अछूत समूह की महिलाएँ अपनी मरज़ी से ये पेशा नहीं अपनातीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही प्रथा उन्हें ऐसा करने को मजबूर करती है.

एक मानवाधिकार प्रवक्ता का कहना है कि इन लोगों के ज़्यादातर बच्चे भी इसी पेशे को करने को मजबूर होते हैं क्योंकि उन्हें आसपास आसानी से कोई और काम नहीं मिलता है.

हालाँकि सुलभ शौचालय जैसे आंदोलन काफ़ी सफल हुए हैं और गाँवों में भी अब फ्लश वाले शौचालय बनने लगे हैं लेकिन ग़रीबी की वजह से सारे लोग इस तरह के शौचालय नहीं बना सकते इसलिए वो परंपरागत शौचालय ही इस्तेमाल करते हैं जिन्हें हर रोज साफ़ करने की ज़रूरत होती है और ये काम अछूत लोग करते हैं.

भारत सरकार ने हाल ही में एक ऐसे विधेयक को मंज़ूरी दी है जिसके तहत शौचालयों से मानव हाथों के ज़रिए मल साफ़ करने की प्रथा का उन्मूलन करने के प्रयास किए जाएंगे.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त ने इस क़दम का स्वागत किया है.

अरब सामाजिक न्याय के लिए आर्थिक प्रगति पर पुनर्विचार की ज़रूरत

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आई एल ओ (ILO) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी यू एन डी पी (UNDP) की एक संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि अरब देशों में जनक्रांतियों ने वहाँ की खोखली विकास नीतियों, सामाजिक न्याय में कोताहियाँ और क़रीब दो दशकों से चले आ रहे आर्थिक उदारीकरण के कुप्रबंधन की पोल खोलकर रख दी है.

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अरब देशों में लोगों को सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने और समाज के विभिन्न तबकों और लोगों के बीच बातचीत के अवसर उपलब्ध कराने में बहुत कमी रही है.

रिपोर्ट कहती है कि अरब देशों में 1990 और 2000 के दशकों में जो नीतियाँ अपनाई गईं उनसे क़र्ज़ दूर करने, महंगाई पर क़ाबू पाने, आर्थिक वृद्धि बढ़ाने और कामकाज बढ़ाने में तो मदद मिली.

लेकिन विकास की गति बाक़ी देशों के मुक़ाबले पिछड़ गई, साथ ही नई नौकरियों के अवसर तो बने लेकिन वो कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में. चिंता की बात ये भी रही कि सरकारों ने इस महत्वपूर्ण पहलू पर बहुत कम ध्यान दिया कि उनकी आर्थिक नीतियों का सामाजिक परिणाम क्या होंगे.

रिपोर्ट के अनुसार आने वाले दशक में आर्थिक प्रगति कुशल प्रशासन से जुड़ी हुई होगी. इसलिए कुशल सरकार मुहैया कराने से ऊची दर पर निवेश आकर्षित किया जा सकेगा और बुनियादी और संस्थानात्मक सुधारों के लिए अनुकूल हालात बनेंगे.

अफ़ग़ानिस्तान में क़रीब चार अरब डॉलर का भ्रष्टाचार

अफ़ग़ानिस्तान में पिछले तीन वर्षों में भ्रष्टाचार की रक़म का आँकड़ा क़रीब चार अरब डॉलर तक पहुँच गया है. छह हज़ार 700 अफ़ग़ान लोगों पर किए गए एक सर्वेक्षण में ये बात सामने आई है.

ये सर्वेक्षण नशीले पदार्थों और अपराध पर संयुक्त राष्ट्र के कार्यालय – यूएनओडीसी (UNODC) और हाई ऑफ़िस फ़ॉर ओवरसाइट एंड करप्शन ने मिलकर किया है.

रिपोर्ट में पता चला है कि वर्ष 2009 और 2012 के दौरान भ्रष्टाचार में 40 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है और भ्रष्टाचार की रक़म तीन अरब 90 करोड़ डॉलर तक पहुँच गई है.

क़रीब 71 प्रतिशत नागरिकों को सार्वजनिक सेवाएँ हासिल करने के लिए रिश्वत देनी पड़ती है.

यूएनओडीसी के क्षेत्रीय प्रतिनिधि जियाँ ल्यूस लेमाहीयू का कहना है कि वर्ष 2012 के दौरान अफ़ग़ान लोगों ने जितनी रिश्वत दी वो देश के घरेलू राजस्व का भी दोगुना थी.

उनका कहना था कि सर्वेक्षण के इन नतीजों से भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एक ठोस रणनीति बनाने में मदद मिलेगी.