4/10/2013

प्रवासियों के भी बुनियादी अधिकार

सुनिए /

"एक स्थान से दूसरे स्थान जाकर जीवन जीने को मजबूर प्रवासी लोग भी इंसान होते हैं और उनके भी कुछ बुनियादी अधिकार होते हैं. उन्हें सिर्फ़ आर्थिक विकास का एजेंट भर नहीं माना जाना चाहिए."

ये कहना है अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार विशेषज्ञों के एक दल का जिसमें 72 स्वतंत्र मानवाधिकर विशेषज्ञ शामिल हैं.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार व्यवस्था से सम्बद्ध इस सबसे बड़ी संस्था ने ये विचार न्यूयॉर्क में 3 और 4 अक्तूबर को आयोजित प्रवासन और विकास नामक सम्मेलन में व्यक्त किए. इस सम्मेलन का आयोजन संयुक्त राष्ट्र महासभा ने किया.

सदस्य देशों को सम्बोधित एक खुले पत्र में इस समूह ने सरकारों, संगठनों और ग़ैरसरकारी संस्थाओं से अनुरोध किया है कि ऐसी व्यवस्था अपनानी चाहिए जिसमें विस्थापित यानी प्रवासियों के हितों का ध्यान रखा जाए.

एक मानवाधिकार विशेषज्ञ चलोका बेयानी का कहना था कि प्रवासन असल में एक इंसानियत का मुद्दा ही है.

इसलिए ये ज़रूरी है कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले प्रवासन के मुद्दे पर होने वाले किसी भी विचार विमर्श में मानवाधिकार मुद्दे को ध्यान में रखा जाए.

इस समूह को ये काम दिया गया है कि वो देशों में मौजूद मानवाधिकार स्थिति पर ख़ास ध्यान दें और सम्बन्धित मुद्दों को उठाएँ.

चकोला बेनयानी ने तमाम देशों का आहवान किया कि वो अन्य मुद्दों के साथ-साथ इस पर भी विचार करें कि अगर कोई लोग अनियमित रूप से किसी अन्य देश में दाख़िल होकर वहाँ रहने लगते हैं तो इसे ग़ैरक़ानूनी ना समझा जाए.

इस तरह के प्रवेश को ग़ैर क़ानूनी बताकर प्रवासियों को बन्दी बनाया लिया जाता है, लेकिन इसका कोई विकल्प तलाशना होगा ताकि लोगों को बन्दी बनाए जाने से होने वाली असुविधा और अपमान से छुटकारा दिलाया जा सके.

प्रवासियों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा को रोका जाए, ख़ासतौर से प्रवासी बच्चों के अधिकारों का सम्मान किया जाए. ऐसा उन सभी देशों में होना चाहिए जहाँ से होकर ये प्रवासी लोग गुज़रते हैं और जो देश उनका अन्तिम पड़ाव है.