27/09/2013

अथक प्रयासों से बाल मज़दूरी में कमी

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अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आई एल ओ की एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2000 के बाद से बाल मज़दूरों की संख्या में कम से कम एक तिहाई कमी आई है.

अब बाल मज़दूरों की संख्या लगभग 24 करोड़ साठ लाख से कम हो कर 16 करोड़ 80 लाख के आसपास रह गई है.

संगठन का कहना है कि हालाँकि ये एक बड़ी कामयाबी है लेकिन बच्चों को मज़दूरी से छुटकारा दिलाने के ये प्रयास काफ़ी नहीं है क्योंकि वर्ष 2016 तक लक्ष्य रखा गया है कि बच्चों को ऐसी मज़दूरी के ऐसे कामों से बिल्कुल छुटकारा दिलाना है जो उनके लिए बहुत ख़तरनाक होते हैं.

रिपोर्ट का कहना है कि क़रीब साढ़े आठ करोड़ बच्चों को बेहद ख़तरनाक काम करने पड़ते हैं जिससे उनका स्वास्थ्य, सुरक्षा और मानसिक व नैतिक विकास ही ख़तरे में पड़ जाता है.

बाल मज़दूरों की सबसे ज़्यादा संख्या एशिया –प्रशान्त क्षेत्र में है जहाँ लगभग सात करोड़ 80 लाख बच्चे मज़दूरी करने को मजबूर हैं.

वर्ष 2000 के बाद से ऐसी लड़कियों की संख्या में भी 40 प्रतिशत की कमी आई है जिन्हें बाल मज़दूरी करनी पड़ती थी.

जबकि बाल मज़दूरी करने वाले लड़कों की संख्या में सिर्फ़ 25 प्रतिशत की कमी ही दर्ज की गई है.

आई एल ओ का कहना है कि वैसे तो ज़्यादातर बाल मज़दूर असंगठित क्षेत्र में होते हैं लेकिन खेतीबाड़ी में सबसे ज़्यादा बाल मज़दूरों को काम करना पड़ता है जिनकी संख्या लगभग दस करोड़ है.

बाल मज़दूरी उन्मूलन पर आई एल ओ के अन्तरराष्ट्रीय कार्यक्रम की निदेशक कान्सटेन्स थॉमस का कहना था, "हमने बाल मज़दूरी की सबसे ख़राब और ख़तरनाक प्रथा को ख़त्म करने के लिए वर्ष 2016 का लक्ष्य रखा है. लेकिन हमें नहीं लगता कि मौजूदा प्रगति की रफ़्तार से इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकेगा. हम ये नहीं चाहते कि रिपोर्ट में आँकड़े दर्ज करने भर के लिए प्रयास करते हुए दिखाए जाएं या फिर देश ये कहकर पल्ला झाड़ लें कि लड़ाई जीत ली गई है."

"अब भी क़रीब 16 करोड़ 80 लाख बच्चे मज़दूरी करने को मजबूर हैं. इनमें से लगभग चार करोड़ तो 14 वर्ष से भी कम उम्र के हैं. ये अब भी मानवाधिकार उल्लंघन और मानवता पर संकट का एक गम्भीर मामला है."

आई एल ओ का ये भी कहना है कि बाल मज़दूरी को समाप्त करने के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति और क़ानून बनाकर उसे लागू करने के पक्के इरादे की ज़रूरत है.

संगठन का कहना है कि बाल मज़दूरी को प्रतिबन्धित करने वाले क़ानून बनाकर उन्हें लागू करने, बच्चों के लिए शिक्षा का इन्तज़ाम करने और उन्हें सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने से भी बाल मज़दूरी के गर्त में फँसे बच्चों की संख्या में ये कमी हो सकी है.