20/09/2013

खेतीबाड़ी को बढ़ावा देने पर ज़ोर

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संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास एजेंसी – अंकटाड ने ग़रीब और धनी, सभी देशों में कृषि यानी खेतीबाड़ी को बढ़ावा दिए जाने पर ख़ास ज़ोर दिया है.

वर्ष 2013 की व्यापार और पर्यावरण रिपोर्ट में अंकटाड ने सिफ़ारिश की है कि सभी देशों में अब खेतीबाड़ी को एक बार में एक फ़सल लेने के तरीक़े से बदलकर एक समय में अनेक फ़सलें उगाने वाला बनाना होगा.

इससे अनाज की ज़रूरत पूरी करने के लिए ज़मीन का भरपूर इस्तेमाल किया जा सकेगा.

अंकटाड ने इस पर भी ख़ास ज़ोर देकर कहा है कि किसानों को खेतीबाड़ी में रसायनिक खाद यानी फर्टीलाइज़र्स का इस्तेमाल भी कम करना होगा.

इसके साथ ही छोटे स्तर के किसानों को ज़्यादा सहायता देने की भी ज़रूरत है.

अंकटाड में व्यापार नीति पर वरिष्ठ सलाहकार उलरिच हॉफ़मैन का कहना था कि सबसे बड़ा सवाल ये दरपेश है कि दुनिया के सबसे ज़्यादा ग़रीब लोग कहाँ रहते हैं, और दुनिया भर में लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिल पाने की समस्या यानी भुखमरी का सामना कैसे किया जा सकता है.

"दुनिया भर में भरपेट भोजन नहीं पा सकने वाली सबसे ज़्यादा आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में बसती है. ऐसे लोगों की लगभग आधी संख्या छोटे किसान हैं जो कड़ी मेहनत से खेतीबाड़ी करके भी भरपेट भोजन का इंतज़ाम नहीं कर पाते हैं."

"दुनिया भर में जितने ग़रीब हैं, उनकी लगभग 90 प्रतिशत आबादी एशिया में बसती है, उसमें भी ख़ासतौर से दक्षिण एशियाई और अफ्रीकी देशों में बसती है.

इस तरह, ग़रीबी दरअसल एक ऐसी समस्या है जिसकी जड़ गाँवों से जुड़ी हुई है. साथ ही मुख्यतः ग़रीबी एक ऐसी समस्या है जो किसानों से भी जुड़ी हुई है जो भरपूर मात्रा में अनाज का उत्पादन नहीं कर पाते हैं. या फिर इन किसानों की आमदनी इतनी नहीं होती कि उससे समुचित मात्रा में भोजन ख़रीदा जा सके."

उन्होंने ये भी ध्यान दिलाया कि दुनिया भर में अनाज और खाद्य पदार्थों का जितना भी उत्पादन होता है वो छोटे किसानों और उत्पादकों के प्रयासों से ही होता है, नाकि अन्तरराष्ट्रीय आपूर्ति एजेंसियों के द्वारा, ये एजेंसियाँ सिर्फ़ सहायक की भूमिका निभाती हैं.

उन्होंने कहा कि लब्बोलुबाव ये है कि छोटे किसान रोज़गार और आमदनी का एक मुख्य स्रोत हैं.

यहाँ तक कि चीन जैसे औद्योगिक देश में भी 60 से 70 करोड़ लोग कृषि पर निर्भर हैं, ये अबादी यूरोप की आबादी से दोगुनी है.