29/08/2013

फ़लस्तीनियों के घर तोड़े जाने पर चिन्ता

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संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त ने इसराइल द्वारा क़ब्ज़ा किए हुए इलाक़ों में जबरन निर्माण गतिविधियाँ चलाए जाने पर गहरी चिन्ता जताई है.

फ़लस्तीनी क्षेत्रों – पश्चिमी तट और पूर्वी येरूशलम में हो रहे इस ग़ैर क़ानूनी निर्माण की वजह से बहुत से फ़लस्तीनियों को बेघर होना पड़ रहा है.

इसराइल इस निर्माण के लिए कुछ फ़लस्तीनियों को उनके घरों से बाहर निकाल रहा है और कुछ को दूसरे स्थानों पर भेज रहा है.

मानवाधिकार उच्चायुक्त के प्रवक्ता सीसिली पाउल्ली ने जिनेवा में पत्रकारों को बताया कि 19 अगस्त को इसराइली अधिकारियों ने पूर्वी येरूशलम के एक इलाक़े- तेल अल अदासा में अरब बेडुइन समुदाय के घरों को तोड़ दिया.

इससे कम से कम सात परिवारों के 39 लोग बेघर हो गए.

इसराइली अधिकारियों ने इन घरों को तोड़ने की वजह ये बताई थी कि जिनके घर तोड़े गए उनके पास ये घर बनाने की अनुमति नहीं थी.

मानवाधिकार उच्चायुक्त की प्रवक्ता सिसिली पाउल्ली  का कहना था, "इसराइली अधिकारियों ने फ़लस्तीनी समुदाय को तुरन्त इलाक़ा ख़ाली करने का आदेश दिया. ऐसा नहीं करने पर भारी जुर्माना भरने और सामान को ज़ब्त करने की धमकी दी. जिनके घर तोड़े गए उन्हें रहने के लिए कोई दूसरी जगह भी देने की पेशकश नहीं की गई इसलिए उनके पास तो कोई विकल्प ही नहीं बचा."

"इसराइली अधिकारियों की तरफ़ से ऐसे बर्ताव से परेशान होकर इन परिवारों को बिछड़ना पड़ा जिसके बाद वो अलग-अलग स्थानों पर रहने के लिए चले गए हैं. लेकिन उन पर फिर से विस्थापित होने का ख़तरा टला नहीं है क्योंकि वो जहाँ भी रहेंगे, उन्हें घर बनाने का क़ानूनी अधिकार नहीं मिल सकेगा. इस मामले को देखा जाए तो इस तरह परिवारों को स्थाई तौर पर विस्थापित या बेघर करना चौथे जिनेवा सम्मेलन की धारा 49 का उल्लंघन माना जा सकता है."

मानवाधिकार उच्चायुक्त की प्रवक्ता सिसिली पाउल्ली ने ये भी कहा कि अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून के तहत तमाम नागरिकों को अपने लिए पर्याप्त और समुचित घर बनाने की आज़ादी है.

साथ ही नागरिकों को अपने निजी जीवन, परिवार और घर में मनमाने और ग़ैरक़ानूनी हस्तक्षेप से भी सुरक्षा हासिल है.

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