1/02/2013

यहूदी बस्तियों से फ़लस्तीनियों के अधिकारों का उल्लंघन

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फ़लस्तीनी क्षेत्रों में सहायता की सख़्त ज़रूरत है

संयुक्त राष्ट्र की एक मानवाधिकार समिति ने कहा है कि इसराइल द्वारा क़ब्ज़ा किए हुए फ़लस्तीनी क्षेत्रों में यहूदी बस्तियों की मौजूदगी ये संकेत देती हैं कि फ़लस्तीनी लोगों के साथ न्याय नहीं हो रहा है.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने क़ब्ज़ा किए हुए फ़लस्तीनी इलाक़ों में तथ्यों का पता लगाने के लिए एक दल बनाया था.

इस दल के तीन क़ानूनी विशेषज्ञ सदस्यों का कहना था कि ये यहूदी बस्तियाँ भेदभाव के जिस आधार पर बसाई गई हैं उनसे फ़लस्तीनी लोगों के अधिकारों का उल्लंघन होता है.

इस दल की एक विस्तृत रिपोर्ट भी प्रकाशित की गई है.

मानवाधिकार परिषद ने इसराइल के मानवाधिकार रिकॉर्ज की जाँच पड़ताल इस वर्ष अक्तूबर – नवंबर तक के लिए स्थगित कर दी है.

मानवाधिकारों की समीक्षा के लिए रखे गए एक विचार-विमर्श में इसराइल की रिपोर्ट पेश नहीं की गई जिसकी वजह से ये फ़ैसला लिया गया.

इसराइल एक मात्र ऐसा देश है जिसने क़रीब पाँच वर्ष पहले हुई इस प्रक्रिया में एक बार भी हिस्सा नहीं लिया है.

सर्वसहमति से इसराइल का आहवान किया गया कि वो मानवाधिकारों की Universal Periodic Review यानी वैश्विक सामयिक समीक्षा की प्रक्रिया में सहयोग करे.

हेती की मानवाधिकार समीक्षा वहाँ आए भूकंप की वजह से स्थगित की गई है.

मानवाधिकार परिषद के अध्यक्ष पोलिश राजदूत रेमिगियूज़ हेंचेल से कहा गया कि वो इसराइल को इस प्रक्रिया में सहयोग करने के लिए समुचित उपाय करें और परिषद के अगले सत्र में प्रगति की जानकारी दें.

इन उपायों को भविष्य में इसी तरह के अन्य मामलों में भी लागू किया जाएगा.

राजदूत रेमिगियूज़ हेंचेल का कहना था कि इस प्रस्ताव की मंशा बिल्कुल साफ़ है जिसमें समीक्षा के दायरे में आने वाले देशों से कहा गया है कि वे समीक्षा प्रक्रिया में सहयोग करें.

“ऐसे देशों के राष्ट्राध्यक्षों से भी अनुरोध किया गया है कि वे अपनी सरकारों को ये सहयोग करने के लिए समुचित उपाय करें. इस संबंध में हुई प्रगति के बारे में परिषद को मार्च में जानकारी दी जाएगी और अगर ज़रूरत हुई तो जून में भी.”

राजदूत रेमिगियूज़ हेंचेल का ये भी कहना था कि जब अंतिम रिपोर्ट पेश की जाएगी तब परिषद ऐसे तमाम उपायों और विकल्पों पर विचार करेगी जडो संयुक्त राष्ट्र महासभा और मानवाधिकार परिषद के प्रस्तावों के अनुरूप होंगे.

एशियाई सक्रियता से आईटी क्षेत्र में  उबाल

संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन यानी अंकटाड (UNCTAD) के ताज़ा आंकड़ों से पता चलता है कि सूचना और संचार प्रोद्योगिकी यानी आसीटी (ICT) के उत्पादों के वैश्विक निर्यात में  चार प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है जो र्बष 2011 में बढ़कर 1.8 ट्रिलियन यानी 18 खरब डॉलर तक पहुँच गया.

सूचना प्रोद्योगिकी में एशिया की अगुवाई

आंकड़ों से पता चलता है कि विकास के रास्ते पर तेज़ी से चल रहे एशिया में व्यापार में आई तेज़ी की वजह से प्रगति दर्ज की गई है जहाँ वर्ष 2011 में आईसीटी उत्पादों का निर्यात 12 ख़रब तक पहुँच गया.

अंकटाड का कहना है कि मोबाइल फ़ोन, स्मार्ट फ़ोन, लैपटॉप, टेबलेट कम्प्यूटर, इंटीग्रेटेड सर्किट और इसी तरह के अन्य आईसीटी चीज़ों का हिस्सा कुल निर्यात के 11 प्रतिशत तक पहुँच गया है. इस निर्यात में चीन अगुवाई कर रहा है जिसने वर्ष 2011 में 508 अरब डॉलर का निर्यात किया.

एशियाई क्षेत्र में वर्ष 2011 में आईसीटी वस्तुओं के आयात में भी बढ़ोत्तरी हुई जो 853 अरब डॉलर का रहा जोकि दुनिया भर के निर्यातका 44 प्रतिशत हिस्सा था.

लाखों यूरोपीय लोग मौन हताशा में जीने को मजबूर

रेड क्रास और रेड क्रेंसेंट सोसायटीज़ के अंतरराष्ट्रीय महासंघ – आई एफ़ आर सी ने आगाह किया है कि यूरोप में लाखों लोग तंगी और क़िल्लत की ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं.

महासंघ का कहना है कि 27 यूरोपीय देशों में लाखों लोग बेरोज़गारी, बढ़ती ग़रीबी, अपना घर नहीं होने और भविष्य के बारे में अनिश्चितता से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं.

यूरोप के अन्य अनेक देशों और मध्य एशिया में भी लाखों लोग ऐसे हालात का सामना कर रहे हैं.

आई एफ़ आर सी की यूरोपीय क्षेत्र की निदेशक अनीता अंडरलिन का कहना है कि जब वर्ष 2008 में ये संकट शुरू हुआ था तो किसी को भी ये अंदाज़ा नहीं था कि ये इतना लंबा चलेगा.

ख़ासतौर से यूरोप में लोगों के लिए ये एक बिल्कुल नई और अनजानी स्थिति है. इन लोगों ने विकास की गति को सिर्फ़ एक ही दिशा में जाते हुए देखा है और वो भी सिर्फ़ ऊपर की ओर.

निदेशक अनीता अंडरलिन का कहना था, “पहली बार हमने ऐसी स्थिति देखी है जिसमें कुछ ऐसे भी देश हैं जिनमें लगभग आधी युवा आबादी के पास ना शिक्षा हासिल कर पाने के साधन हैं और ना ही करने को कुछ रोज़गार है. हालाँकि ये भी कुछ तसल्ली की बात है कि लोगों में भाईचारे और सहयोग की भावना भई बढ़ रही है.”

अनीता अंडरलिन के अनुसार जिन देशों में दान करने और संसाधन बाँटने की संस्कृति रही है वहाँ लोग खुले दिल से अन्य लोगों को अपने संसाधान दे रहे हैं.

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