25/01/2013

शांति अभियानों और टिकाऊ स्थिरता के लिए नई नीति

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संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून

सुरक्षा परिषद ने संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों के लिए एक नई नीति को मंज़ूरी दी है जिसके तहत संघर्ष ग्रस्त देशों और क्षेत्रों में स्थाई शांति और टिकाऊ स्थिरता के लिए हालात तैयार करने पर ज़ोर दिया जाएगा.

सर्वसहमति से पारित एक प्रस्ताव में कहा गया है कि संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियान के तहत तमाम गतिविधियों का लक्ष्य संघर्ष के बाद के माहौल में टिकाऊ शांति स्थापित करना होना चाहिए.

प्रस्ताव में ये भी कहा गया है कि सशस्त्र संघर्ष फिर से शुरू होने से रोकने और टिकाऊ शांति और प्रगति के लिए अनुकूल माहौल बनाने पर ज़्यादा ज़ोर होना चाहिए.

सुरक्षा परिषद के इस प्रस्ताव में कहा गया है कि भविष्य में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए बहुरुख़ी शांति अभियान चलाए जा सकते हैं जिनमें अनेक तरह की गतिविधियों के बीच तालमेल बिठाया जा सके.

 बच्चों को संकट से बचाने के लिए 1.4 अरब डॉलर की सहायता की अपील

संयुक्त राष्ट्र बाल संस्था – यूनीसेफ़ (UNICEF) ने अनेक देशों में मानवीय संकट की स्थिति में बच्चों को सहायता मुहैया कराने के लिए क़रीब एक अरब चालीस करोड़ डॉलर की अतिरिक्त राशि जुटाने की अपील की है.

एजेंसी का कहना है कि 45 देश और क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ हिंसक संघर्ष, प्राक्रतिक आपदाएँ और अन्य जटिल आपदाओं की वजह से बच्चों को जीवन संरक्षण सहायता की तुरंत ज़रूरत है.

यूनीसेफ़ के आपदा कार्यक्रमों के निदेशक टेड चायबैन का कहना था कि ऐजेंसी के पास पर्याप्त संसाधन नहीं होने की स्थिति में अक्सर कठिन फ़ैसले लेने होते हैं कि संकट से जूझ रहे किन देशों में मदद पहुचाई जाए या नहीं.

डेड चायबैन का कहना था, "आज यूनीसेफ़ पूरी दुनिया के संकटग्रस्त देशों और क्षेत्रों में बच्चों की सुरक्षा के लिए एक अरब 40 करोड़ डॉलर का कार्यक्रम शुरू कर रहा है. इनमें स्वभाविक रूप से सीरिया और माली शामिल हैं लेकिन इनमें मैडागास्कर, कोलंबिया और अन्य क्षेत्र भी हैं जिन्हें या तो भुला दिया गया है या फिर उन पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया है.”

“माली के बारे में कुछ शब्द कहें तो हम उत्तरी क्षेत्र में मौजद परिस्थितियों के बारे में बहुत चिंतित हैं. वहाँ बहुत से बच्चे विस्थापित हुए हैं, स्कूल नहीं जा पाते हैं और हिंसक परिस्थितियों का शिकार हैं जिसकी वजह से अनेक सशस्त्र और हिंसक ग्रुप उन्हें हथियार चलाने के लिए भर्ती कर लेते हैं."

सीरिया के बारे में निदेशक टैड चायबैन का कहना था कि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की एक आपदा टीम के सदस्य के रूप हाल ही में वहाँ का दौरा किया और देखा कि लोग किन मुश्किल हालात में जीने को मजबूर हैं.

उन्होंने कहा कि बुनियादी ढाँचा तहस-नहस हो गया है, बहुत से परिवार बहुत ही छोटे-छोटे स्थानों पर रहने और सर्दी के मौसम में गरम कपड़ों के बिना ही रहने को मजबूर हैं. यहाँ तक कि पीने का पानी, भोजन और मामूली दवाएँ भी उपलब्ध नहीं हैं.

सीरिया के कृषि ढाँचे को भारी नुक़सान और उत्पादन में भारी कमी

संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने कहा है कि सीरियाई लोगों की मदद के लिए हर संभव प्रयास और उपाय करने होंगे.

महासचिव का कहना था, "हमें हिंसा रुकवाने के लिए कूटनीति, बातचीत और अन्य सभी उपाय करने होंगे जिनमें सीरियाई पक्षों, मध्य पूर्व क्षेत्र और सुरक्षा परिषद में मौजूद मतभेदों को दूर करना शामिल है.”

“मैं सभी देशों का आहवान करता हूँ कि वो सीरिया में दोनों पक्षों को हथियार देना बंद कर दें."

इस बीच संयुक्त राष्ट्र के एक मिशन ने पता लगाया है कि सीरिया में पिछले क़रीब 22 महीनों से जारी संकट की वजह से कृषि उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई है और कृषि बुनियादी ढाँचा और सिंचाई सुविधाएँ बुरी तरह प्रभावित हुई हैं.

अनाज, फल और सब्ज़ियों का उत्पादन लगभग आधा रह गया है.

मिशन ने पाया है कि गेहूँ और बाजरे का उत्पादन सामान्य रूप में 40 से 45 लाख टन रहता था जिसमें अब बीस लाख टन की कमी आई है.

होम्स और दारा इलाक़ों में सब्ज़ियों, फल और ज़ैतून के उत्पादन में भारी कमी आई है.

संयुक्त राष्ट्र मिशन ने रिपोर्ट किया है कि सिर्फ़ 45 प्रतिशत किसान ही अपनी खेतीबाड़ी ठीक तरह से कर पाए हैं, जबकि 14 प्रतिशत किसानों का कहना है कि समुचित सुरक्षा नहीं होने और ईंधन की कमी की वजह से वो अपनी खेतीबाड़ी सामान्य रूप में नहीं कर पाए.

इसके अलावा किसानों को उत्तम क़िस्म के बीज और खाद नहीं मिलने और बुनियादी ढाँचे को हुए नुक़सान की वजह से समय पर सिंचाई नहीं हो पाने की वजह से भी कृषि उत्पादन में कमी आई है.

खाद्य और कृषि संगठन के आपदा और पुनर्वास खंड के निदेशक डोमिनिक बरजियाँ का कहना था कि ये स्पष्ट है कि जितना लंबा ये संघर्ष चलेगा, लोगों का पुनर्वास करने में उतना ही ज़्यादा समय लगेगा.

सीरिया में लगभग एक करोड़ लोग ग्रामीण इलाक़ों में रहते हैं जिनमें से 80 प्रतिशत यानी क़रीब 80 लाख लोग कृषि पर निर्भर हैं. ये कुल आबादी का लगभग 46 प्रतिशत है.

सीरिया सहायता के लिए जॉर्डन में टीम गठित

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यू एच ओ (WHO) ने सीरिया, जॉर्डन, लेबनान, इराक़, मिस्र और तुर्की में अपने दफ़्तरों को तकनीकी और प्रशासनिक सहायता मुहैया कराने के लिए जॉर्डन में एक आपात टीम का गठन किया है.

सीरिया में कृषि ढाँचे को भारी नुक़सान

WHO का कहना है कि सीरियाई शहर होम्स में 13 सरकारी अस्पताल ठप हो गए हैं जिनमें मुख्य अस्पताल भी शामिल है. ये संख्या कुल अस्पतालों का 46 प्रतिशत है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सीरिया के इदलेब, होम्स, और ग्रामीण दमिश्क में तीन महीनों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं में सहायता करने के लिए चार अन्य ग़ैरसरकारी संगठनों के साथ एक सहमति पत्र पर दस्तख़त किए हैं.

लेबनान के सामाजिक मामलों के मंत्रालय ने कहा है कि सीरिया से वापिस लौट चुके लगभग बीस हज़ार लेबनानियों को रहने के लिए जगह और अन्य मानवीय सहायता की सख़्त ज़रूरत है.

 वर्ष 2013 के लिए संयुक्त राष्ट्र योजना महासभा में पेश

संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने आशा व्यक्त की है कि सदस्य देश विश्व में मौजूद समस्याओं का सामना करने के लिए एक संकट से दूसरे संकट और एक लक्षण से दूसरे लक्षण पर ध्यान देने के बजाय उन समस्याओं की जड़ पर ध्यान देंगे.

संयुक्त राष्ट्र महासभा को इस वर्ष के अपने पहले संबोधन में महासचिव बान की मून ने कहा, "अफ्रीका और मध्य पूर्व में सशस्त्र संघर्ष से लेकर, दुनिया भर में आर्थिक मंदी का दौर, पर्यावरण संबंधी चुनौतियाँ, इन सभी क्षेत्रों में जैसे हर दिन और हर मिनट हमारा इम्तेहान हो रहा है.”

“मेरी नज़र में पाँच ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ कार्रवाई करने की ज़रूरत है और अगर सामूहिक रूप से क़दम उठाए जाएँ तो ठोस बदलाव लाया जा सकता है. इनमें टिकाऊ विकास, अहतियाती उपाय, बदलाव के दौर से गुज़र रहे देशों की मदद, ज़्यादा सुरक्षित विश्व बनाना और महिलाओं और युवाओं को सशक्त बनाना शामिल हैं."

वर्ष 2013 में संयुक्त राष्ट्र के सामने दरपेश चुनौतियों का ज़िक्र करते हुए महासचिव बान की मून ने कहा कि हमें नए वर्ष में मतभेदों से ऊपर उठकर ये दिखाना होगा कि समस्याओं का अंतरराष्ट्रीय हल हर देश के हित में है.

वैश्विक शिक्षा को उच्च प्राथमिकता देने का आहवान

शिक्षा को अपने दूसरे कार्यकाल की प्राथमिकता बताते हुए महासचिव बान की मून ने कहा है कि शिक्षा लोगों को ना सिर्फ़ सशक्तीकरण देती है बल्कि उनका जीवन भी बदलने की क्षमता रखती है, प्रगति सुनिश्चित करती है और शांतिपूर्ण और टिकाऊ भविष्य का आधारशिला भी है.

स्विटज़रलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच यानी World Economic Forum के सम्मेलन में बान की मून ने कहा कि विश्व के राजनीतिक और विकास एजेंडाओं में शिक्षा उच्च प्राथमिकता होनी चाहिए. और ये कोई इच्छा या अनिच्छा का बात नहीं बल्कि अनिवार्यता है.

महासचिव ने ये भी कहा कि वैश्विक शिक्षा अभियान की तीन बड़ी प्राथमिकताएं हैं – कि हर बच्चे को स्कूल मुहैया कराना, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना और वैश्विक नागरिकता को बढ़ावा देना.

ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन वैश्विक शिक्षा अभियान के लिए संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत हैं.

 इसराइल और फ़लस्तीनियों से गतिरोध दूर करने का आग्रह

मध्य पूर्व के लिए विशेष शांति दूत रॉबर्ट सैरी ने इसराइली और फ़लस्तीनी नेताओं को आगाह किया है कि विवाद को हल करने के लिए बातचीत शुरू करने में देरी से सभी के लिए गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

रॉबर्ट सैरी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को संबोधित करते हुए ये बात कही. उन्होंने कहा कि इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच लगातार जारी संघर्ष से स्थिति बहुत निराशाजनक बनी हुई है.

रॉबर्ट सैरी ने सुरक्षा परिषद से कहा कि एक बिल्कुल नई राजनीतिक पहल नहीं की गई तो ये निराशाजनक स्थिति यूँ ही बने रहने की आशंका है, “कोई बातचीत नहीं होने की स्थिति में परिणाम सभी के लिए गंभीर हो सकते हैं. इसलिए दोनों पक्षों को मौजूदा गतिरोध दूर करने के लिए ना सिर्फ़ लचीला होना चाहिए बल्कि उन्हें गंभीरता भी दिखानी होगी.”

“अगर इसराइल दो देशों के हल के लिए गंभीर है तो उसे फ़लस्तीनी इलाक़ों में यहूदी बस्तियाँ बढ़ाने के नकारात्मक असर के बारे में भी सोचना होगा. दूसरी तरफ़ फ़लस्तीनी नेता ऐसा करके अपनी गंभीरता दिखा सकते हैं कि जब तक बातचीत शुरू नहीं होती है, तब तक वो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई अन्य कार्रवाई ना करें."

रॉबर्ट सैरी ने कहा कि दोनों पक्षों को बातचीत के ज़रिए दो देशों के रूप में समाधान को अपनी प्रतिबद्धता दिखानी होगी जो संयुक्त राष्ट्र चार्टर और सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के अनुरूप होगा.

भोजन बर्बाद होने से बचाने का आहवान

दुनिया भर में हर वर्ष लगभग एक अरब 30 करोड़ खाना बर्बाद कर दिया जाता है जो कुल खाद्य उत्पाद का लगभग एक तिहाई हिस्सा है.

खाना बर्बादी पर चिंता

खाना बर्बादी पर चिंता

इस भोजन बर्बादी को रोकने के लिए उपभोक्ताओं और दुकानदारों का आहवान किया गया है.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक अचिम स्टाइनर ने जिनेवा में – सोचें, खाएँ और बचाएं, अभियान शुरू करते हुए कहा कि खाना बर्बाद करना हर तरह से बिल्कुल वाहियात है – आर्थिक नज़र से, पर्यावरण के लिए और नैतिक नज़रिए से भी.

उनका कहना था कि खाना बर्बादी से बचाने की इस मुहिम में हर उपभोक्ता और हर व्यक्ति बहुत अहम भूमिका निभा सकता है.

ये आश्चर्यजनक बात नहीं है कि आद्योगिक देशों में ज़्यादा मात्रा में खाना बर्बाद होता है.

खाद्य और कृषि संगठन के एक सर्वेक्षण में अनुमान लगाया गया है कि अफ्रीका और दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में खाने की बर्बादी औसतन 11 किलोग्राम प्रति उपभोक्ता है जबकि यूरोप और उत्तरी अमरीकी देशों में औसतन एक उपभोक्ता हर साल क़रीब 115 किलोग्राम खाना बर्बाद कर देता है.

खाद्य और कृषि संगठन की उप महानिदेशक आन टुटवाइलर का कहना है कि खाने की बर्बादी को क़तई सही नहीं ठहराया जा सकता, “आन कह रही थीं कि अफ्रीकी देशों में जितना खाद्य उत्पादन होता है, विकसित देशों में उतना खाना बर्बाद कर दिया जाता है.”

“जब हम खाना बर्बाद करते हैं तो हम ऊर्जा, ज़मीन, पानी, मेहनत और अन्य मानव संसाधनों की भी बर्बादी कर रहे होते हैं.”

सोचें, खाएँ और बचाएँ अभियान के तहत उपभोक्ताओं, दुकानदारों और होटलों – रेस्तराओं से खाना बर्बादी कम करने का आहवान किया गया है.

मध्यम वर्ग के रोज़गार में बढ़ोत्तरी की उम्मीद

संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन यानी आई एल ओ ( ILO) ने कहा है कि विकास शील देशों में पिछले एक दशक के दौरान मध्यम वर्ग में रोज़गार बढ़ा है जिससे अर्थव्यवस्थाओं में वृद्धि होने की संभावना भी बढ़ी है.

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के वर्ष 2013 के विश्व रोज़गार आंकड़ों में दिखाया गया है कि विकासशील देशों में 42 प्रतिशत कामकाजी मध्यम वर्ग से हैं जिनकी संख्या लगभग एक अरब दस करोड़ के क़रीब है.

ये लोग अपने परिवारों के साथ रहते हुए प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति लगभग चार अमरीकी डॉलर में गुज़र बसर करते हैं.

ये चलन ख़ासतौर से पूर्वी एशियाई देशों में ज़्यादा देखा गया है.

वर्ष 2001 के बाद से क़रीब चालीस करोड़ अतिरिक्त कामकाजी मध्यम वर्ग में शामिल हुए हैं जिनकी आमदनी इतनी है कि वो प्रतिदिन प्रति व्यक्ति चार से 13 अमरीकी डॉलर के बीच ख़र्च कर सकते हैं.

इसके अलावा क़रीब साढ़े 18 करोड़ अन्य कामकाजी प्रतिदिन 13 अमरीकी डॉलर प्रतिव्यक्ति पर गुज़र कर सकते हैं.

श्रम संगठन का अनुमान है कि वर्ष 2017 तक विकासशील देशों में मध्यम वर्ग के कामकाजियों की संख्या में लगभग 39 करोड़ की वृद्धि होगी.

इस रिपोर्ट के एक लेखक स्टीवन कैपसॉस का कहना है, "निकट भविष्य में ये उभरता मध्यमवर्ग संतुलित वैश्विक विकास को बढ़ावा देने में ठोस मदद कर सकता है क्योंकि इनकी आमदनी के साथ साथ ख़र्च बढ़ेगा, ख़ासतौर से ग़रीब स्थानों पर.”

स्टीवन कैपसॉस कहते हैं कि मध्यमवर्गीय कामकाजी लोग स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में ज़्यादा ख़र्च और निवेश करते हैं जिससे उनका जीवन ज़्यादा स्वस्थ और रचनात्मक होगा. दूसरे शब्दों में कहें तो इसका मतलब होगा उच्च उत्पादन दर और तीव्र गति से आर्थिक विकास.

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