26/07/2013

जनप्रतिनिधि अन्तरराष्ट्रीय क़र्ज़ों से बेख़बर

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यह चौंकाने वाली बात है कि दुनिया की 40 प्रतिशत से ज़्यादा संसदों के पास अपने देशों की सरकारों द्वारा लिए जाने वाले अन्तरराष्ट्रीय क़र्ज़ों को मंज़ूर या नामंज़ूर करने के क़ानूनी अधिकार नहीं होते हैं.

ये क़र्ज़े विश्व बैंक और अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ़ से लिए जाते हैं और इनका फ़ैसला सरकारें संसद की मंज़ूरी के बिना ही कर लेती हैं.

Inter Parliamentary Union (IPU) यानी अन्तर संसदीय संघ और विश्व बैंक के एक संयुक्त अध्ययन में ये बात सामने आई है.

ये रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के क़रीब दो तिहाई देशों की संसदों का अपने देश की सरकारों द्वारा अन्तरराष्ट्रीय क़र्ज़ लेने की प्रक्रिया में कोई दख़ल नहीं होता है.

आई पी यू के महासचिव आंद्रेस जॉहन्सन का कहना है कि देशों की सरकारों द्वारा लिए जाने वाले अन्तरराष्ट्रीय क़र्ज़ की संसदों द्वारा अनदेखी करना बहुत गम्भीर मुद्दा है, क्योंकि ये क़र्ज़ लेने के लिए अक्सर नीतियों और क़ानूनों में बदलाव करने पड़ते हैं जिनसे आम नागरिकों के जीवन पर प्रतिकूल असर भी पड़ सकता है.

उनका कहना है कि संसद सदस्यों को ये फ़ैसला लेने का अधिकार होना चाहिए कि सरकार जो अन्तरराष्ट्रीय क़र्ज़ लेने की कोशिश कर ही है, क्या उसकी वाक़ई ज़रूरत भी है, ये भी देखना चाहिए कि कहीं ये क़र्ज़ देश के बजट पर कोई बोझ बनकर तो नहीं रह जाएगा.

आई पी यू की प्रवक्ता जैमिनी पांड्या का कहना था, "सरकार पर संसद की निगरानी एक स्वच्छ और प्रभावशाली प्रशासन देने के लिए बहुत ज़रूरी है, क्योंकि राष्ट्रीय विकास योजनाएँ अगर नाकाम होती हैं तो उनकी ज़िम्मेदारी ख़राब प्रशासन पर होती है. और ज़्यादातर संसदें इस घटनाक्रम से अनजान रहती हैं."

"ये एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर आई पी यू काम कर रहा है. किसी भी देश में सरकारों की जवाबदेही तय करने में संसद की भूमिका निर्धारित और मज़बूत करके, विकास के नतीजों में सुधार सुनिश्चित किया जा सकता है. और किसी भी लोकतांत्रिक समाज में संसद की ये एक बहुत महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी है."

ये नया अध्ययन संसदों की ज़िम्मेदारी और जवाबदेही मज़बूत करके विकास नतीजों में सुधार करने के उद्देश्य से किया गया था, और इसमें क़रीब 100 देशों की संसदों के विचार लिए गए.

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